अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा राजनीति को लेकर बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने दावा किया है कि भारत अब ईरान से कच्चा तेल खरीदने के बजाय वेनेजुएला से तेल आयात करेगा। उनके अनुसार अमेरिका ने इस दिशा में पहले से ही एक संभावित समझौते का ढांचा तैयार कर लिया है, जिसके तहत भारत की ऊर्जा जरूरतों को वेनेजुएला के जरिए पूरा करने पर सहमति बन सकती है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका दोनों ही क्षेत्र वैश्विक तेल बाजार में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए कड़े आर्थिक और ऊर्जा संबंधी प्रतिबंधों का सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ा है। प्रतिबंधों के कारण भारत लंबे समय से ईरान से बड़ी मात्रा में तेल आयात नहीं कर पा रहा है, जबकि एक समय ईरान भारत के प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल था। ईरानी तेल की खासियत उसकी प्रतिस्पर्धी कीमत और अनुकूल भुगतान शर्तें थीं, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को लाभ मिलता था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारत को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ी।
डोनाल्ड ट्रंप के दावे के बाद वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बातचीत की है। इस बातचीत में ऊर्जा क्षेत्र के साथ-साथ द्विपक्षीय व्यापार और निवेश बढ़ाने पर चर्चा हुई। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और प्रतिबंधों के कारण उसका उत्पादन और निर्यात लंबे समय से प्रभावित रहा है। ऐसे में भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश के साथ सहयोग वेनेजुएला के लिए भी आर्थिक रूप से अहम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता। इसी नीति के तहत भारत पहले ही रूस, सऊदी अरब, इराक और अमेरिका जैसे देशों से तेल आयात बढ़ा चुका है। अगर वेनेजुएला से तेल आयात की संभावनाएं वास्तव में आगे बढ़ती हैं, तो इससे भारत को आपूर्ति के नए विकल्प मिल सकते हैं, हालांकि इसमें लॉजिस्टिक्स, भुगतान व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों जैसे पहलुओं पर सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना होगा।
फिलहाल भारत सरकार की ओर से ट्रंप के दावे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि वैश्विक राजनीति, अमेरिकी प्रतिबंध और ऊर्जा बाजार की बदलती परिस्थितियां भारत की तेल खरीद नीति को लगातार प्रभावित कर रही हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या यह दावा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है या वास्तव में भारत की ऊर्जा रणनीति में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।
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