May 4, 2026

इमरान खान के बेटे कासिम और सुलेमान की चूक बनी रुकावट, अब नहीं हो पाएंगे आंदोलन में शामिल

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के बेटे कासिम और सुलेमान इस समय एक बड़ी गलती के कारण सुर्खियों में हैं। दोनों बेटे 5 अगस्त को शुरू होने वाले राष्ट्रव्यापी आंदोलन में अपने पिता के समर्थन में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। इसकी वजह है उनका प्रवासी नागरिक कार्ड—एक का कार्ड खो चुका है और दूसरे का एक्सपायर हो चुका है।

 

इमरान की बहन आलीमा खान ने बताया कि दोनों बेटों ने नए कार्ड के लिए आवेदन कर दिया है, लेकिन 5 अगस्त से पहले मिलना संभव नहीं है। ऐसे में जब इमरान खान की पार्टी पूरे देश में सरकार और सेना के खिलाफ हल्ला बोलने जा रही है, उनके अपने बेटे आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकेंगे। यह चूक पार्टी के लिए भावनात्मक रूप से एक झटका है।

 

पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी ने इस मसले पर मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि उन्हें नहीं पता कि दोनों बेटों ने कार्ड के लिए कहां आवेदन किया है। उन्होंने कहा कि अगर दूतावास में किया है, तो वहीं से वैरिफिकेशन होगा और वही तय करेगा कि कार्ड कितनी जल्दी जारी हो सकते हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर उनके पास प्रवासी नागरिक कार्ड है, तो वीजा के लिए आवेदन क्यों किया गया? यह पूरी प्रक्रिया अब प्रशासनिक जांच के घेरे में आ गई है।

 

गौरतलब है कि 5 अगस्त से इमरान खान की पार्टी पीटीआई पूरे पाकिस्तान में आंदोलन शुरू करने जा रही है। इमरान इस वक्त रावलपिंडी की अदियाला जेल में बंद हैं और उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। पार्टी का आरोप है कि यह सब सेना प्रमुख असीम मुनीर के इशारे पर हो रहा है और इमरान की आवाज को दबाया जा रहा है। इस आंदोलन का नेतृत्व खुद इमरान की बहन आलिमा, पार्टी अध्यक्ष बैरिस्टर गौहर और खैबर पख्तूनख्वा के सीएम अली गंडारपुर कर रहे हैं।

 

इमरान खान इस आंदोलन को ‘लोकतंत्र बचाने की आखिरी लड़ाई’ बता चुके हैं। ऐसे में उनके बेटों का इसमें शरीक न हो पाना केवल पारिवारिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि पार्टी के उत्साह के लिए भी एक बड़ा झटका है। ये साफ है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं की छोटी सी लापरवाही या अनदेखी बड़े आंदोलनों की तस्वीर को भी प्रभावित कर सकती है।

 

अब सवाल ये है कि क्या कासिम और सुलेमान इस आंदोलन के अहम पड़ावों में आगे जाकर शामिल हो पाएंगे या नहीं? क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक मुद्दा है या इसके पीछे कोई और राजनीतिक गणित छिपा है? आने वाले दिनों में इन सवालों के जवाब खुद सामने आ सकते हैं।

 

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