April 18, 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट बनाम सुप्रीम कोर्ट: जस्टिस प्रशांत कुमार पर SC के फैसले से भड़के जज, 13 न्यायधीशों ने CJI को लिखा पत्र

देश की न्यायपालिका में असामान्य स्थिति देखने को मिल रही है। सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के बीच एक प्रशासनिक आदेश को लेकर टकराव की स्थिति बन गई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार को आपराधिक मामलों की सुनवाई से रोकने की बात कही, जिस पर हाईकोर्ट के 13 सीनियर जजों ने कड़ी आपत्ति जताई है। इन न्यायाधीशों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली को पत्र लिखकर फुल कोर्ट मीटिंग बुलाने की मांग की है।

मामला 4 अगस्त 2025 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि जस्टिस प्रशांत कुमार को उनकी सेवानिवृत्ति तक क्रिमिनल केसों की सुनवाई से हटाया जाए। साथ ही, आदेश में यह भी निर्देश दिया गया कि उन्हें किसी वरिष्ठ और अनुभवी जज के साथ खंडपीठ में शामिल किया जाए। यह आदेश जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने दिया था।

इस आदेश को लेकर जस्टिस अरिंदम सिन्हा और अन्य जजों ने कड़ी आपत्ति जताई है। जस्टिस सिन्हा ने अपने पत्र में लिखा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश बिना नोटिस के जारी किया गया, और इसमें न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार के खिलाफ तीखी टिप्पणियां भी की गई हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि हाईकोर्ट इस आदेश का पालन न करे क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के पास हाईकोर्ट के प्रशासनिक मामलों में अधीक्षण का अधिकार नहीं है।

दरअसल, विवाद की जड़ वह फैसला है जिसमें जस्टिस प्रशांत कुमार ने यह कहा था कि दीवानी मामलों में पैसे की वसूली के लिए आपराधिक प्रक्रिया का सहारा लिया जा सकता है, क्योंकि सिविल मुकदमे वर्षों तक चलते हैं। इस तर्क को सुप्रीम कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया और आदेश में कहा गया कि यह विचार न्यायिक दृष्टिकोण से गंभीर रूप से गलत है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीशों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप न केवल अनुचित है बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाता है। अब इस पूरे मामले में फुल कोर्ट मीटिंग के जरिए सामूहिक प्रतिक्रिया देने की तैयारी की जा रही है। यह घटना न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और अधिकार-सीमा को लेकर एक बड़ी बहस को जन्म दे सकती है।

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