ग्राम पंचायतों का बजट 5 साल में घटकर लगभग आधा, 15वें वित्त आयोग के आंकड़ों में बड़ा खुलासा
पिछले पांच वर्षों में देश की ग्राम पंचायतों के बजट में भारी कटौती देखी गई है। 15वें वित्त आयोग के तहत केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले अनुदान में यह कमी स्पष्ट तौर पर नज़र आती है। साल 2020-21 में जहां 60 हजार करोड़ रुपये का फंड जारी किया गया था, वहीं 2024-25 में यह घटकर महज़ 37 हजार करोड़ रुपये रह गया है। इस कटौती का सीधा असर ग्रामीण विकास योजनाओं और पंचायतों के बुनियादी ढांचे पर पड़ रहा है।
आंकड़े बताते हैं कि कोविड-19 महामारी के बाद बजट में गिरावट और तेज हो गई। महामारी के शुरुआती साल में ही कई योजनाओं के फंड रोक दिए गए और बाद में भी यह स्थिति पूरी तरह बहाल नहीं हो पाई। कई राज्यों में 30 से 40 प्रतिशत तक की सीधी कटौती दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस गिरावट ने पंचायतों की वित्तीय स्वायत्तता और विकास कार्यों की गति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों पर भी इस कमी का असर पड़ा है। यूपी की ग्राम पंचायतों का बजट 2020-21 में 9,752 करोड़ रुपये था, जो घटकर 2024 में 7,994 करोड़ रुपये रह गया—यानि करीब 1,800 करोड़ रुपये की कमी। कोविड वर्ष के बाद से बजट में हल्की-फुल्की बढ़ोतरी जरूर हुई, लेकिन अब तक यह पुराने स्तर पर नहीं पहुंच सका है।
बिहार में भी यही स्थिति देखने को मिली। विधानसभा चुनाव वर्ष 2020 में राज्य को 5,018 करोड़ रुपये का अनुदान मिला था, लेकिन इसके बाद लगातार कटौती होती गई। पांच साल में करीब 1,000 करोड़ रुपये की कमी आई है, जिससे कई पंचायत परियोजनाएं अधूरी रह गईं। बंगाल में भी हर साल लगभग 200 करोड़ रुपये की कमी हुई, जिसके चलते 2020 के 4,412 करोड़ रुपये के बजट से घटकर यह 3,617 करोड़ रुपये पर आ गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुझान आने वाले समय में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, सड़क निर्माण, जलापूर्ति और स्वच्छता जैसे बुनियादी कार्यों पर नकारात्मक असर डालेगा। 15वें वित्त आयोग की मौजूदा अवधि समाप्त होने के बाद नई सिफारिशें क्या दिशा लेंगी, इस पर अब सबकी नज़र है। फिलहाल, राज्यों को सीमित बजट में ही अपनी विकास योजनाओं को पूरा करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
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