अलीगढ़ में कल्याण सिंह हैबिटेट सेंटर में भारतीय शिक्षा बोर्ड (BSB) की मंडलीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें शिक्षा व्यवस्था में संस्कृति और संस्कारों की अहमियत पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। यह बैठक 20 नवंबर को संपन्न हुई और इसमें मंडल के विभिन्न विद्यालयों के प्रबंधक, प्राचार्य और प्रतिनिधि बड़ी संख्या में शामिल हुए। कार्यक्रम की शुरुआत वेद मंत्रों के साथ दीप प्रज्ज्वलन से हुई, जिससे यह संदेश दिया गया कि भारतीय शिक्षा मॉडल की जड़ें सदियों पुरानी वैदिक परंपरा में निहित हैं।
संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डॉ. एन.पी. सिंह ने उपस्थित जनों को भारतीय शिक्षा बोर्ड की आवश्यकता और उसकी स्थापना के उद्देश्य के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि वर्तमान पाश्चात्य शिक्षा मॉडल ने भौतिक विकास तो दिया है, लेकिन नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण को भी तेज किया है। भारत में छात्रों के नैतिक पतन की बढ़ती चिंता को देखते हुए शिक्षा में भारतीय संस्कृति, शास्त्र, वेद, उपनिषद और गीता जैसे आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश अनिवार्य हो गया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारतीय शिक्षा बोर्ड का उद्देश्य बच्चों को चरित्रवान, संस्कारयुक्त, आध्यात्मिक रूप से मजबूत और आधुनिक तकनीकी ज्ञान से समृद्ध बनाना है।
मुख्य अतिथि मंडलायुक्त संगीता सिंह ने भी अपने संबोधन में शिक्षा में संस्कारों की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों में मूल्यों का निर्माण केवल विद्यालय नहीं बल्कि घर का वातावरण और शिक्षक की आदर्श भूमिका भी करती है। उन्होंने उपस्थित प्रतिनिधियों से अपील की कि वे बड़े-बड़े आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के बजाय प्राचीन वैदिक ज्ञान-संस्कृति की ओर लौटते हुए भारतीय शिक्षा बोर्ड के साथ संबद्धता बढ़ाएँ। उनके अनुसार, एक मूल्य आधारित शिक्षा प्रणाली ही भारत को सशक्त और संस्कारवान राष्ट्र बना सकती है।
संगोष्ठी में वक्ताओं ने यह भी कहा कि भौतिकतावादी जीवनशैली की चकाचौंध में बच्चों का मानसिक दृष्टिकोण तेजी से बदल रहा है। ऐसे समय में आवश्यकता है कि शिक्षा उन्हें प्रकृति, भारतीय ज्ञान-विज्ञान और आध्यात्मिक शिक्षाओं से पुनः जोड़े। यही मार्ग भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने की दिशा में अगला कदम साबित होगा। उपस्थित विद्यालय प्रतिनिधियों को प्रोत्साहित किया गया कि वे अपने संस्थानों को भारतीय शिक्षा बोर्ड से जोड़कर इस वैकल्पिक शिक्षा मॉडल को मजबूत आधार दें।
कार्यक्रम में 300 से अधिक विद्यालयों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिसमें पतंजलि परिवार, भारत स्वाभिमान और विभिन्न शिक्षा संगठनों से जुड़े पदाधिकारी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। गोष्ठी के अंत में यह संकल्प लिया गया कि भविष्य में शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम नहीं बल्कि संस्कार, चरित्र और राष्ट्रीय गौरव से जोड़कर विकसित किया जाएगा।
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