भारत, रूस, चीन सबने अफगानिस्तान में भूकंप पीड़ितों को पहुंचाई मदद, अमेरिका अब तक खामोश क्यों?
भारत, रूस, चीन सबने अफगानिस्तान में भूकंप पीड़ितों को पहुंचाई मदद, अमेरिका अब तक खामोश क्यों
अफगानिस्तान इस समय एक भयंकर मानवीय संकट से गुजर रहा है। हफ्ते भर पहले आए भीषण भूकंप ने हजारों परिवारों को तबाह कर दिया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अब तक 2200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और लाखों लोग बेघर हो गए हैं। यह त्रासदी 2021 में तालिबान के सत्ता संभालने के बाद तीसरी बड़ी आपदा है जिसने देश को झकझोर दिया है। अफगानिस्तान की स्थिति पहले ही आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही थी, ऐसे में यह भूकंप वहां के लोगों के लिए और गहरी त्रासदी बन गया है।
इस आपदा के बाद कई देश आगे आए और अफगानिस्तान को मदद पहुंचाई। भारत ने तुरंत राहत सामग्री और मेडिकल सहायता भेजी। रूस और चीन ने भी बड़े स्तर पर दवाइयां, भोजन और राहत सामग्री पहुंचाई। तुर्कमेनिस्तान, बांग्लादेश और अन्य पड़ोसी देशों ने भी पीड़ितों की मदद के लिए हाथ बढ़ाया। इन कदमों ने न केवल अफगानिस्तान के लोगों को राहत दी बल्कि यह भी दिखाया कि क्षेत्रीय देश इस कठिन समय में तालिबान शासन वाले अफगानिस्तान को नजरअंदाज नहीं कर रहे।
इसके विपरीत, दुनिया की सबसे बड़ी ताकत माने जाने वाले अमेरिका का रवैया अभी तक खामोश रहा है। अमेरिका, जिसने बीते दो दशकों तक अफगानिस्तान में अपनी गहरी मौजूदगी दर्ज कराई थी, अब इस मानवीय संकट पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं दे रहा। इस चुप्पी को लेकर सवाल उठने लगे हैं कि आखिर क्यों अमेरिका, जिसने खुद को हमेशा मानवीय मूल्यों का पक्षधर बताया है, आज अफगानिस्तान की त्रासदी पर चुप है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे अमेरिका और तालिबान शासन के बीच तनावपूर्ण रिश्ते भी हो सकते हैं। तालिबान की सरकार को आधिकारिक मान्यता न देने की वजह से अमेरिका शायद सीधे तौर पर मदद देने से बच रहा है। हालांकि मानवीय संकट की इस घड़ी में अमेरिका की चुप्पी वैश्विक स्तर पर आलोचना का कारण बन रही है। बहुत से अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे मौके पर राजनीति से ऊपर उठकर लोगों की जान बचाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
कुल मिलाकर, अफगानिस्तान इस वक्त अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है और दुनिया भर से मदद की उसे बेहद जरूरत है। भारत, रूस और चीन जैसे देशों की सक्रियता ने पीड़ितों को राहत जरूर पहुंचाई है, लेकिन अमेरिका की चुप्पी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मानवीय संवेदनाएं भी अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति की भेंट चढ़ रही हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिका अपनी चुप्पी तोड़कर अफगानिस्तान की मदद करता है या इस आपदा को केवल कूटनीतिक चश्मे से ही देखता रहेगा।
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