ईरान बना ‘मिनी पाकिस्तान’? ट्रंप से टकराव के बाद ताश के पत्तों की तरह बिखर रही अर्थव्यवस्था, सेना पर खुला खजाना, जनता पर टूटा कहर
डोनाल्ड ट्रंप से पंगा लेना ईरान को भारी पड़ता दिख रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने देश की रीढ़ तोड़ दी है और अब हालात इस हद तक बिगड़ चुके हैं कि ईरान को दूसरा ‘पाकिस्तान’ कहा जाने लगा है।
एक ओर इस्लामिक शासन सैन्य ताकत बढ़ाने के जुनून में अंधा हो गया है, तो दूसरी ओर आम जनता पेट भरने के लिए जूझ रही है। देश की मुद्रा रियाल की कीमत आधी हो चुकी है, महंगाई 40% से ऊपर है, बेरोजगारी 70% तक पहुंच चुकी है और हर बीतते दिन के साथ आर्थिक संकट और गहराता जा रहा है।
पैसे की तंगी जनता के लिए, सेना के लिए खोला खजाना
ईरान की इस्लामिक सरकार ने नए वित्त वर्ष में सैन्य बजट में 200% की बेतहाशा वृद्धि की है। वहीं करों का बोझ आम लोगों पर डाल दिया गया है। पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ शोधकर्ता मोहम्मद मशीन चियान का कहना है कि सरकार इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और क्षेत्रीय सैन्य अभियानों पर जरूरत से ज्यादा फोकस कर रही है। जबकि आम लोगों के लिए राहत देने वाला कोई ठोस प्लान सामने नहीं आया।
अमेरिका के वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट ने हाल में तीखा बयान दिया – “अगर मैं ईरानी होता, तो अपनी सारी जमा पूंजी रियाल से निकाल लेता।” यह बयान उस अविश्वास को दर्शाता है जो अब खुद वैश्विक वित्त जगत में ईरान की अर्थव्यवस्था को लेकर पनप चुका है।
2019 जैसी आग दोबारा भड़क सकती है
तेल बेचकर ईरान ने 2024 में भले ही 54 अरब डॉलर कमाए हों, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों ने इस कमाई को स्थिर नहीं रहने दिया। अगर तेल निर्यात पर पूरी तरह रोक लग गई, तो सरकार के पास डॉलर नहीं बचेंगे – न पेट्रोल पर सब्सिडी दे पाएगी, न खाद्य सामग्री की कीमतें काबू में रख पाएगी।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर सरकार ने पेट्रोल के दाम बढ़ाए, तो 2019 जैसे भयानक विरोध प्रदर्शन दोबारा भड़क सकते हैं – जब अचानक कीमतों में इजाफे के चलते सैकड़ों लोग मारे गए थे और हजारों गिरफ्तार हुए थे।
मूल लक्ष्य: सत्ता बचाना, न कि जनता को राहत देना
वियना इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकनॉमिक स्टडीज़ के अर्थशास्त्री मेहदी गोदसी का मानना है कि यह ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद का सबसे खराब दौर है – यहां तक कि ईरान-इराक युद्ध के आठ सालों में भी हालात इतने बदतर नहीं थे।
उन्होंने साफ तौर पर कहा, “अब सरकार का एकमात्र लक्ष्य सत्ता में बने रहना है – चाहे इसके लिए देश को युद्ध की ओर धकेलना पड़े, या जनता को भुखमरी की कगार पर क्यों न पहुंचा देना पड़े।”
राष्ट्रपति पेजेशकियान से नहीं दिख रही राहत की उम्मीद
ईरान के राष्ट्रपति मसऊद पेजेशकियान के पद संभालने के बाद भी कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया है। आरोप है कि उनके बजट में आम लोगों के लिए कोई ठोस राहत योजना शामिल नहीं की गई। उलटा, सैन्य खर्चों और क्षेत्रीय प्रभुत्व की होड़ में ही सारा फोकस झोंक दिया गया है।
तो क्या ईरान भी अब ‘पाकिस्तान’ की राह पर?
भ्रष्टाचार, सैन्यीकरण, आर्थिक कुप्रबंधन, और जनता की उपेक्षा – यही वो लक्षण हैं जो पाकिस्तान की गिरती हालत को परिभाषित करते हैं। और अब यही लक्षण ईरान में भी तेजी से उभर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह रुझान ऐसे ही जारी रहा, तो जल्द ही ईरान भी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता के उस गर्त में पहुंच सकता है, जहां से निकलना मुश्किल होगा।
अब सवाल यह नहीं है कि हालात कितने खराब हैं – सवाल यह है कि ईरान कब तक इस कगार पर टिका रह पाएगा, और क्या जनता की चुप्पी लंबे समय तक कायम रह पाएगी?
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