वाराणसी आज एक बार फिर दीपों की अनगिनत लौ से जगमगा उठा है। कार्तिक पूर्णिमा के शुभ अवसर पर मनाई जाने वाली देव दीपावली को काशी की “असल दीपावली” कहा जाता है। यह वह दिन होता है, जब मान्यता के अनुसार देवता स्वयं धरती पर उतरते हैं और गंगा तटों को प्रकाश से आलोकित कर देते हैं। शहर के घाट, मंदिर और गलियां मिट्टी के दीयों से सजे हुए हैं। हर लौ में श्रद्धा, परंपरा और बनारसी जीवन की आत्मा झिलमिला रही है।
काशी में यह पर्व मात्र एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोक और देव परंपरा का अद्भुत संगम है। पंचगंगा, दशाश्वमेध, मणिकर्णिका और अस्सी घाटों पर असंख्य दीये जलाकर श्रद्धालु देवताओं का स्वागत करते हैं। मिट्टी के इन दीयों में बनारस की मिट्टी की सुगंध, कुम्हार की मेहनत, सरसों तेल की बासंती आभा और लोक परिश्रम का सौंदर्य झलकता है। घाटों पर ऊंचे बांसों पर लटकते “आकाशदीप” इस परंपरा को आकाशीय रूप देते हैं—जो यह संदेश देते हैं कि दीया केवल रोशनी नहीं, बल्कि ज्ञान, श्रम और आस्था का प्रतीक है।
कार्तिक माह का आध्यात्मिक महत्व
धर्मशास्त्रों के अनुसार कार्तिक, माघ और वैशाख महीने स्नान, जप और दान के लिए अत्यंत पवित्र माने गए हैं। कार्तिक मास में भगवान विष्णु के जागरण से लेकर तुलसी विवाह, देवोत्थान एकादशी और कार्तिक पूर्णिमा तक अनेक धार्मिक पर्व मनाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस महीने गंगा स्नान, दीपदान और दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में वर्णन है कि इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध कर देवताओं को मुक्ति दिलाई थी, इसलिए इसे “देव दीपावली” कहा गया।
बनारस के घाटों पर जब हजारों दीये एक साथ जलते हैं, तो गंगा का अर्धचंद्राकार तट प्रकाश से नहाया हुआ लगता है। बचपन में यह आयोजन पूरी तरह लोक-प्रेरित था—न कोई सरकारी तामझाम, न कोई आयोजन समिति। लोग स्वयं अपने घरों से दीये लेकर घाटों पर पहुंचते थे। यह सामूहिक आस्था और आत्मीयता का पर्व था। आज यह आयोजन विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हो चुका है, लेकिन साथ ही इसमें व्यावसायिकता भी बढ़ी है।
आस्था से आयोजन तक—बदलती बनारस की देव दीपावली
समय के साथ यह परंपरा अब भव्य पर्यटन उत्सव में बदल गई है। घाटों के मठ और घर अब होटल बन चुके हैं। आम दिनों में कुछ हजार में मिलने वाले कमरे अब कार्तिक पूर्णिमा पर लाखों में बुक होते हैं। बड़ी नावें, जो पहले पांच हजार में मिल जाती थीं, अब दो लाख तक किराए पर जाती हैं। फिर भी इस आयोजन की आत्मा—वह दीया, वह आस्था, वह गंगा की ठंडी हवा में बहती भक्ति—आज भी जीवित है।
जो बनारसी कभी बालपन में ठिठुरती सुबह गंगा में डुबकी लगाकर लौटता था, वह अब उसी स्मृति को जीवित रखने घाटों पर लौटता है। दशाश्वमेध से अस्सी घाट तक बहता दीपों का सागर आज भी यही कहता है कि गंगा केवल नदी नहीं, जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। देव दीपावली उसी जीवनधारा का उत्सव है, जहां आस्था, प्रकृति और परिश्रम मिलकर प्रकाश का अनंत संसार रचते हैं।
इसलिए कहा जाता है—जहां काशी की गंगा बहती है, वहीं देव दीपावली असल दीपावली होती है।
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