दिल्ली हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया पर कंधे चौड़े रखने की दी सलाह, मानहानि केस में अहम फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोशल मीडिया पर कंधे चौड़े रखने की सलाह देते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने मानहानि से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह कहा कि सोशल मीडिया पर किसी भी पोस्ट की आलोचना या सराहना होना तय है, और आलोचनाओं को सहन करने के लिए यूजर्स को मानसिक रूप से मजबूत और ‘कंधे चौड़े’ होने चाहिए। यह टिप्पणी उस समय आई जब एक ऑनलाइन लीगल एजुकेशन प्लेटफॉर्म ने मानहानि का मामला दर्ज कराया था।
क्या था मामला?
ऑनलाइन लीगल एजुकेशन प्लेटफॉर्म “लॉ सीखो” ने सोशल मीडिया पर नेशनल लॉ ग्रैजुएट्स (एनएलयू) की आलोचना करते हुए एक पोस्ट की थी, जिस पर चार छात्रों ने प्रतिक्रिया दी। इस प्रतिक्रिया को प्लेटफॉर्म ने मानहानि मानते हुए कोर्ट में मामला दायर किया था। कोर्ट में सुनवाई करते हुए, जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा ने अपने फैसले में कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी भी पोस्ट की आलोचना की जा सकती है और इसके लिए यूजर्स को आलोचना सहन करने की क्षमता रखनी चाहिए।
कोर्ट का रुख: क्या था अदालत का फैसला?
अदालत ने इस मामले में 54 पेज का फैसला सुनाया, जिसमें उन्होंने कहा कि एक राय व्यक्त करना दंडनीय नहीं है, जब तक वह किसी तरह का ठोस नुकसान न पहुंचाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर किए गए किसी भी पोस्ट की आलोचना या सराहना की जा सकती है और इस तरह की आलोचनाओं को सहन करना यूजर्स की जिम्मेदारी है। फैसले में न्यायमूर्ति अरोड़ा ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म मानहानि का मामला दर्ज कराता है, तो उसे पहले सूचना प्रौद्योगिकी के तहत निवारण की कोशिश करनी चाहिए, जैसा कि 2021 के मध्यवर्ती दिशानिर्देशों और डिजिटल मीडिया आचार संहिता में उल्लेखित है।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का तर्क:
मुकदमे में “लॉ सीखो” ने तर्क दिया कि उसने जो मुख्य ट्वीट किया था वह अच्छे इरादे से किया गया था, ताकि यह कानून के छात्रों, कानून फर्मों और शैक्षणिक संस्थानों पर सकारात्मक प्रभाव डाले। इस प्लेटफॉर्म ने यह भी कहा कि छात्रों द्वारा की गई प्रतिक्रिया अपमानजनक थी और उसे साइबरस्पेस में बदनाम किया गया। इसके साथ ही, उन्होंने यह दावा किया कि ट्वीट्स ने उनकी प्रतिष्ठा और वित्तीय स्थिति को नुकसान पहुंचाया, और इससे उनके निवेशकों के विश्वास पर असर पड़ा।
कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
कोर्ट ने “लॉ सीखो” पर 1 लाख डॉलर का जुर्माना लगाया और कहा कि मुख्य ट्वीट ऑनलाइन ट्रोलिंग के मापदंडों के अंतर्गत आता है। न्यायमूर्ति अरोड़ा ने अपने फैसले में कहा कि प्लेटफॉर्म को पहले निवारण की प्रक्रिया का पालन करना चाहिए था, जो कि सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत अनिवार्य था। इसके अलावा, अदालत ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर राय व्यक्त करना, जब तक कि वह किसी ठोस नुकसान का कारण न बने, दंडनीय नहीं है।
अदालत का संदेश:
अदालत का यह फैसला सोशल मीडिया यूजर्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत विचार और आलोचनाओं को सहन करने के लिए मानसिक रूप से मजबूत होना चाहिए। यह फैसला सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और उसके दुरुपयोग की रोकथाम के संदर्भ में एक नई दिशा दर्शाता है।
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