ठारी हत्याकांड के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है। मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने उसे बरी कर दिया, जिसके बाद बुधवार को उसे गौतमबुद्ध नगर की लुक्सर जेल से रिहा किए जाने की संभावना है। जेल अधीक्षक बृजेश सिंह ने बताया कि अदालत का आदेश गाजियाबाद जिला न्यायाधीश को भेजा गया है, और वहां से आदेश की प्रति जेल पहुंचने के बाद रिहाई की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। कोली को करीब दो साल पहले गाजियाबाद जेल से लुक्सर जेल स्थानांतरित किया गया था, जहां उसकी पत्नी और बेटा अक्सर मिलने आते थे।
साल 2006 के निठारी हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। नोएडा के सेक्टर 31 स्थित डी-5 बंगले के पीछे नाले से दिसंबर 2006 में मानव खोपड़ियां और कंकाल बरामद हुए थे। जांच में यह मामला सुरेंद्र कोली और उसके मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर से जुड़ा पाया गया था। 2007 में सीबीआई ने जांच अपने हाथ में ली और कई मामलों में दोनों को दोषी ठहराते हुए गाजियाबाद की अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी। कोली को 2009 से 2021 तक कुल छह मामलों में फांसी की सजा दी गई थी, जबकि पंढेर को कुछ मामलों में बरी कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अब कोली की सुधारात्मक याचिका स्वीकार करते हुए उसकी सजा रद्द कर दी है। न्यायालय ने माना कि साक्ष्यों में गंभीर खामियां थीं और जांच में कई स्तरों पर लापरवाही बरती गई थी। कोर्ट के इस फैसले के बाद कोली को सभी लंबित मामलों से बरी कर दिया गया। इस निर्णय के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि यदि कोली और पंढेर निर्दोष हैं, तो आखिर निठारी में बच्चों की हत्या किसने की? यह सवाल अब भी अनुत्तरित है और पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की उम्मीद को झटका लगा है।
निठारी में मारे गए बच्चों के परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। एक पीड़ित पिता ने कहा, “अगर कोली और पंढेर ने ये हत्याएं नहीं कीं, तो क्या घर में भूत था जिसने हमारे बच्चों को मारा?” उन्होंने कहा कि अब भगवान ही न्याय करेगा और जिन्होंने पैसे लेकर इस केस को कमजोर किया, उन्हें भी एक दिन सजा मिलेगी। कई परिजनों ने जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं और मांग की है कि असली दोषियों को खोजने के लिए नई जांच कराई जाए।
गौरतलब है कि यह मामला भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे लंबे और जटिल मामलों में से एक रहा है। 18 साल बाद भी पीड़ित परिवार न्याय की प्रतीक्षा में हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भले ही कानूनी दृष्टि से अंतिम हो, लेकिन सामाजिक और मानवीय दृष्टि से इसने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। निठारी के इस काले अध्याय का अंत भले अदालत के फैसले से हुआ हो, मगर उन परिवारों का दर्द और सवाल अब भी जिन्दा हैं।
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