सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब न्यायिक अधिकारी भी बन सकेंगे जिला जज, बार कोटे से मिलेगी अनुमति
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अब न्यायिक अधिकारी भी बन सकेंगे जिला जज, सीधी भर्ती पर आया ऐतिहासिक निर्णय
संविधान पीठ ने कहा – बार कोटे के तहत पात्र होंगे वे अधिकारी जिन्होंने सेवा में आने से पहले 7 साल वकालत की हो; राज्यों को 3 माह में नए नियम बनाने के निर्देश
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायिक अधिकारी, जिन्होंने सेवा में आने से पहले बार में कम से कम सात साल तक प्रैक्टिस की है, वे जिला जज के पद पर सीधी भर्ती के पात्र होंगे। मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ (CJI) की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने यह फैसला सुनाया, जिसने न्यायिक सेवा और वकीलों के बीच लंबे समय से चली आ रही पात्रता विवाद को सुलझा दिया।
पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 233 के तहत जिला जज की नियुक्ति के लिए “अधिवक्ता” और “न्यायिक अधिकारी” दोनों ही पात्र माने जा सकते हैं, बशर्ते उनके पास संयुक्त रूप से सात वर्ष का अनुभव हो। अदालत ने कहा कि संविधान की व्याख्या “सहज और व्यावहारिक” होनी चाहिए, न कि पांडित्यपूर्ण। सीजेआई ने कहा – “कोई भी व्याख्या जो प्रतिस्पर्धा को सीमित करे, स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायिक अधिकारियों को सीधी भर्ती से वंचित करके उनके साथ अन्याय किया गया था।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल फैसले की तिथि से लागू होगा और पहले से जारी चयन प्रक्रियाओं को इससे प्रभावित नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने राज्यों और उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया कि वे तीन महीनों के भीतर जिला जजों की भर्ती से संबंधित नियमों में संशोधन करें। इन संशोधित नियमों में यह सुनिश्चित किया जाए कि सेवा में आने से पहले बार में सात साल की प्रैक्टिस पूरी कर चुके न्यायिक अधिकारी भी बार कोटे के तहत आवेदन करने के पात्र हों।
मुख्य न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि जब कोई व्यक्ति न्यायिक सेवा में प्रवेश करता है, तो उसका वकालत करने का अधिकार केवल निलंबित होता है, समाप्त नहीं होता। इस प्रकार, ऐसे अधिकारी जिन्होंने भर्ती से पहले बार में सात साल का अनुभव हासिल किया है, उन्हें भी सीधी भर्ती के लिए पात्र माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी तय किया कि जिला जज और अतिरिक्त जिला जज पदों के लिए आवेदन करने वालों की न्यूनतम आयु 35 वर्ष होगी।
जस्टिस सुंदरेश ने अपने सहमति वाले निर्णय में कहा कि अनुच्छेद 233 की व्याख्या केवल वकीलों तक सीमित नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा, “यदि संविधान का उद्देश्य श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली न्यायपालिका का निर्माण है, तो उसमें सभी योग्य प्रतिभाओं को शामिल किया जाना चाहिए। किसी समूह को केवल उनकी वर्तमान स्थिति के आधार पर बाहर करना असंवैधानिक होगा।”
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से अब उन न्यायिक अधिकारियों को भी नई उम्मीद जगी है जिन्होंने वकालत का पर्याप्त अनुभव होने के बावजूद जिला जज की सीधी भर्ती में आवेदन नहीं कर सके थे। यह फैसला न्यायिक सेवा में समान अवसर और संवैधानिक संतुलन की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
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