नई दिल्ली में लोकपाल कार्यालय इस समय चर्चा के केंद्र में है। वजह है—लक्ज़री गाड़ियों की चाहत। लोकपाल ऑफिस ने BMW 330 LI मॉडल की कारें खरीदने के लिए टेंडर जारी किया है, जिसकी कीमत प्रति गाड़ी 60 लाख रुपए से अधिक बताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 7 गाड़ियां खरीदी जाएंगी, जिन पर लगभग 5 करोड़ रुपए का खर्च आने वाला है। इस फैसले के बाद लोकपाल पर विपक्षी पार्टियों ने सवालों की बौछार कर दी है।
कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने लोकपाल के इस कदम को प्रधानमंत्री मोदी के “स्वदेशी अभियान” के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि लोकपाल को भारत में निर्मित कारों को प्राथमिकता देनी चाहिए थी। दीक्षित ने तंज कसते हुए कहा, “लोकपाल ने शायद ही कोई बड़ा भ्रष्टाचार मामला सुलझाया हो, लेकिन अब करोड़ों की बीएमडब्ल्यू खरीदने की तैयारी है। यह संस्था रिटायरमेंट के बाद आराम की नौकरी बन गई है।”
वहीं, तेलंगाना के कांग्रेस नेता समा राम मोहन रेड्डी ने आरोप लगाया कि पिछले 11 सालों में लोकपाल ने मोदी सरकार के किसी भी भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई नहीं की। अब वही लोकपाल 5 करोड़ की लग्जरी कारों पर पैसा खर्च कर रहा है। उन्होंने मांग की कि इस टेंडर को तुरंत रद्द किया जाए और संस्था की जवाबदेही तय की जाए।
नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सुझाव दिया कि लोकपाल को BMW की जगह महिंद्रा जैसी भारतीय कंपनी के इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने चाहिए, ताकि यह संस्था “स्वदेशी और सतत विकास” के उदाहरण के रूप में सामने आ सके।
इस मामले पर पूर्व IPS अधिकारी किरण बेदी ने भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, “लोकपाल जैसी संस्था से ऐसे फैसले की उम्मीद नहीं थी। यह देखकर दुख होता है कि जिन पर ईमानदारी की जिम्मेदारी है, वही अब सुविधा और विलासिता की ओर झुक गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी महंगी गाड़ियां खरीदने की मंजूरी किसने दी और इसकी जरूरत क्या थी?”
बता दें कि लोकपाल संस्था 2019 में गठित की गई थी, जिसके चेयरपर्सन जस्टिस ए.एम. खानविल्कर हैं। अब तक लोकपाल ने 34 मामलों में जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन ज्यादातर छोटे स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है। बड़े मामलों में सिर्फ टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और शिबू सोरेन के नाम सामने आए थे। अब इस बीएमडब्ल्यू विवाद ने संस्था की साख और उद्देश्य दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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