May 2, 2026

बिहार में विदेशी घुसपैठियों की वोटर लिस्ट से सफाई की तैयारी, SIR प्रक्रिया पर गरमाई सियासत

बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर आ चुकी है, जहां वोटर लिस्ट की सफाई ने चुनावी समीकरणों में जबरदस्त हलचल मचा दी है। चुनाव आयोग ने राज्य में SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के तहत मतदाता सूची से अवैध रूप से शामिल नेपाली, बांग्लादेशी और म्यांमार के नागरिकों के नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि 30 सितंबर 2025 को प्रकाशित होने वाली अंतिम वोटर लिस्ट में इन विदेशियों के नाम नहीं रहेंगे। यही बात अब विपक्षी खेमे में भारी बेचैनी का कारण बन गई है।

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस जैसे दल इस कदम को सीमांचल की राजनीति में हस्तक्षेप मान रहे हैं। सीमांचल इलाके की 24 सीटों को लेकर विपक्षी दलों की चिंता गहराई हुई है, क्योंकि यह क्षेत्र मुस्लिम बहुल है और यहां की जनसंख्या में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिन पर विदेशी नागरिक होने का संदेह है। दरअसल, 2020 के विधानसभा चुनाव में सीमांचल की इन सीटों पर AIMIM, महागठबंधन और कुछ अन्य दलों ने मिलकर बेहतरीन प्रदर्शन किया था। लेकिन अगर बड़ी संख्या में वोटर लिस्ट से नाम हटते हैं, तो इसका सीधा असर इन पार्टियों की स्थिति पर पड़ सकता है।

2020 के विधानसभा चुनाव में राज्य की 52 सीटों पर हार-जीत का अंतर 5 हजार वोटों से भी कम रहा था और 83 सीटों पर 10 हजार से भी कम वोटों से नतीजे तय हुए थे। इनमें से 28 पर RJD और 10 पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। इतना ही नहीं, पूरे राज्य में केवल 12,768 वोटों के अंतर से महागठबंधन बहुमत से पीछे रह गया था और तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनते-बनते चूक गए थे। अब अगर आयोग की कार्रवाई में करीब 1 फीसदी वोटर यानी 8 लाख लोगों के नाम कट जाते हैं, तो विपक्ष को करारा झटका लग सकता है।

SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्ष ने न केवल बिहार बंद का ऐलान किया था, बल्कि सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया है। कोर्ट ने आयोग से आधार कार्ड को भी पहचान पत्र के रूप में स्वीकारने का सुझाव दिया था। दिलचस्प बात यह है कि सीमांचल क्षेत्र के किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार और अररिया जिलों में 100 फीसदी से अधिक आधार कार्ड रजिस्टर्ड हैं, जबकि वहां की आबादी मुस्लिम बहुल है। उदाहरण के तौर पर, किशनगंज में कुल आबादी के मुकाबले 105.16 फीसदी आधार पंजीकरण दर्ज किया गया है।

स्थानीय प्रशासन को यह भी संदेह है कि बड़ी संख्या में लोग आधार कार्ड का इस्तेमाल निवास प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए कर रहे हैं। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुद बताया है कि हाल ही में एक हफ्ते के भीतर दो लाख से अधिक निवास प्रमाण पत्र के लिए आवेदन दिए गए, जिसमें सबसे अधिक किशनगंज से रहे। माना जा रहा है कि यह हलचल वोटर लिस्ट को प्रभावित करने की मंशा से हो सकती है।

आयोग का कहना है कि एक अगस्त से घर-घर सर्वे कर फर्जी वोटरों की पहचान की जाएगी और तय प्रक्रिया के तहत उनके नाम हटाए जाएंगे। लेकिन इस बीच सवाल ये है कि क्या यह प्रक्रिया निष्पक्ष होगी या वाकई सीमांचल की सियासत में एक बड़ा बदलाव लाएगी? क्या इससे आगामी चुनाव में वोट प्रतिशत और परिणामों पर गहरा असर पड़ेगा?

फिलहाल एक बात तय है—बिहार की 243 विधानसभा सीटों में कम वोटों के अंतर से तय होने वाली तकदीर अब SIR की छांव में पुनः लिखी जा सकती है। और इस बार यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि सत्ता की कुर्सी का असली आधार साबित हो सकता है।

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