May 5, 2026

भारत अब हथियार नहीं, साझेदारी की शर्त पर दोस्ती निभाता है

भारत की नई रक्षा नीति अब पूरी तरह से “आत्मनिर्भर भारत” की दिशा में अग्रसर हो चुकी है। अब वह केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं रह गया, बल्कि तकनीक साझा करने और को-डेवलपमेंट की शर्तों पर ही रक्षा सौदों को आगे बढ़ा रहा है। अमेरिका और रूस जैसी महाशक्तियों द्वारा दिए गए आधुनिक हथियारों के प्रस्तावों को भारत ने ठुकरा दिया है, क्योंकि उनमें तकनीक ट्रांसफर और रणनीतिक स्वायत्तता की शर्तें शामिल नहीं थीं।

अमेरिका का F-35 फाइटर जेट कभी भारतीय वायुसेना के लिए प्रमुख विकल्प माना जा रहा था, लेकिन अब यह डील लगभग खत्म हो चुकी है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि अमेरिका इस विमान के साथ भारत को न तो पूरी तकनीकी जानकारी देने वाला था, न ही इसका रखरखाव भारतीय प्रणाली के अनुरूप होता। इसके अलावा, भारत ने खुद अपनी रडार प्रणाली से F-35B को ट्रैक कर लिया था, जिससे उसकी स्टील्थ टेक्नोलॉजी पर भी सवाल खड़े हो गए।

रूस की ओर से भी भारत को Su-57E जैसे फिफ्थ जेनरेशन फाइटर जेट का प्रस्ताव मिला है, जिसमें तकनीक और सोर्स कोड ट्रांसफर की बात शामिल है। फिर भी भारत ने जल्दबाज़ी में कोई निर्णय नहीं लिया है और इस प्रस्ताव पर सावधानी से विचार कर रहा है। भारत का स्पष्ट संदेश है कि अब वह हथियारों का सिर्फ उपभोक्ता नहीं, निर्माता भी बनना चाहता है। भारत का ध्यान अब अपने स्वदेशी AMCA प्रोजेक्ट पर केंद्रित है, जो एक पूर्णतः घरेलू 5वीं पीढ़ी का फाइटर जेट होगा।

सिर्फ फाइटर जेट ही नहीं, अमेरिका द्वारा भारत को पेश किए गए अन्य रक्षा सिस्टम जैसे Stryker Armored Vehicle और Javelin मिसाइलें भी भारत की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं। लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में Stryker वाहन की परफॉर्मेंस असंतोषजनक रही और Javelin मिसाइल की लागत और लॉजिस्टिक्स भारत के दीर्घकालिक दृष्टिकोण से मेल नहीं खा पाए। इसके स्थान पर भारत अब अपने Zorawar टैंक, FICV और MPATGM जैसी स्वदेशी परियोजनाओं को आगे बढ़ा रहा है।

भारत की यह बदली हुई रणनीति दर्शाती है कि वह न तो अमेरिका पर निर्भर रहना चाहता है और न रूस पर। अब टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, को-डेवलपमेंट और स्वदेशी निर्माण उसकी प्राथमिकताएं हैं। फ्रांस, इजराइल और जापान जैसे देशों के साथ तकनीकी सहयोग और रक्षा विकास को भारत तरजीह दे रहा है। अब भारत वही हथियार अपनाएगा, जो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक रक्षा जरूरतों को पूरा करते हों।

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