April 20, 2026

मुख्य शीर्षक: बानू मुश्ताक को ‘हार्ट लैंप’ के लिए इंटरनेशनल बुकर प्राइज, कन्नड़ साहित्य को मिला वैश्विक गौरव

भारतीय लेखिका, पत्रकार, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता बानू मुश्ताक ने अंतरराष्ट्रीय साहित्य जगत में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। उन्हें वर्ष 2025 का प्रतिष्ठित इंटरनेशनल बुकर प्राइज उनकी कन्नड़ भाषा में लिखी गई कहानी संग्रह ‘हार्ट लैंप’ के लिए प्रदान किया गया है। यह पहली बार है जब किसी कन्नड़ साहित्यिक कृति को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा गया है, जिससे न केवल बानू मुश्ताक का नाम वैश्विक साहित्य मंच पर चमका है, बल्कि कन्नड़ भाषा और भारतीय साहित्य को भी एक नई पहचान मिली है।

 

बानू मुश्ताक कर्नाटक की रहने वाली हैं और उन्होंने अपने जीवन में कई रूपों में योगदान दिया है – एक वकील, पत्रकार, कवि, उपन्यासकार और एक प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में। उनकी लेखनी का फलक व्यापक है और उनकी कहानियों में सामाजिक सच्चाइयों, हाशिए पर मौजूद आवाज़ों और मानवीय संवेदनाओं को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। ‘हार्ट लैंप’ नामक इस कहानी संग्रह में कुल 12 लघु कहानियां शामिल हैं, जिन्हें लिखने में बानू को लगभग 30 वर्षों का समय लगा। यह रचना सिर्फ साहित्यिक उत्कृष्टता नहीं, बल्कि जीवन के गहन अनुभवों और सामाजिक संघर्षों का दस्तावेज़ भी मानी जा रही है।

 

इंटरनेशनल बुकर प्राइज 2025 की घोषणा 20 मई को लंदन के प्रतिष्ठित टेट मॉडर्न संग्रहालय में आयोजित एक समारोह के दौरान की गई। इस वर्ष निर्णायक मंडल की अध्यक्षता प्रसिद्ध लेखक मैक्स पोर्टर ने की। पुरस्कार की घोषणा करते हुए पोर्टर ने कहा कि ‘हार्ट लैंप’ कई वर्षों में अंग्रेजी पाठकों के लिए सबसे अनोखी और सशक्त पेशकशों में से एक है। यह संग्रह न केवल हमारे अनुवाद की समझ को चुनौती देता है, बल्कि उसे और समृद्ध करता है।

 

इस ऐतिहासिक पुरस्कार में अनुवादक की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है और बानू मुश्ताक की कृति का कन्नड़ से अंग्रेजी में अनुवाद लेखिका और अनुवादक दीपा भष्ठी ने किया। उन्होंने मूल कन्नड़ कहानियों की आत्मा को बनाए रखते हुए उसे एक वैश्विक मंच पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया, जिसकी व्यापक सराहना की जा रही है।

 

बानू मुश्ताक का यह सम्मान उन भारतीय भाषाओं के लिए एक प्रेरणा है, जिन्हें अब तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वह पहचान नहीं मिल पाई थी जिसकी वे हकदार थीं। कन्नड़ भाषा में रचित साहित्य की समृद्ध परंपरा को ‘हार्ट लैंप’ के माध्यम से जो वैश्विक पहचान मिली है, वह आने वाले वर्षों में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लेखकों और लेखिकाओं को भी प्रोत्साहित करेगी।

 

इस उपलब्धि ने न सिर्फ बानू मुश्ताक के रचनात्मक जीवन को एक नई ऊंचाई दी है, बल्कि यह कन्नड़ भाषा, भारतीय साहित्य और अनुवाद साहित्य की दुनिया के लिए भी एक मील का पत्थर साबित हुआ है। साहित्य प्रेमियों के लिए यह गौरव और प्रेरणा का क्षण है।

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