बांदा में बाढ़ ने बढ़ाई मुश्किलें, पीड़ितों को राहत की जगह मिल रही उपेक्षा
बुंदेलखंड का बांदा ज़िला इस समय भीषण बाढ़ की चपेट में है। लगातार हो रही बारिश के कारण कई गांवों में पानी भर गया है और लोग घरों से बाहर निकलने को मजबूर हैं। बाढ़ के कारण जनजीवन पूरी तरह ठप हो गया है। खेत डूब चुके हैं, रास्ते कट गए हैं और लोग छतों या ऊंचे स्थानों पर शरण लिए हुए हैं।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जिन लोगों ने किसी तरह बाढ़ से अपनी जान बचाई है, अब वे भूख और प्यास से लड़ रहे हैं। राहत सामग्री के नाम पर उन्हें कुछ भी ढंग से नहीं मिल रहा। प्रशासन का रवैया इतना लापरवाह है कि लोग बेसहारा महसूस कर रहे हैं।
स्थानीय ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि तहसील और लेखपाल स्तर के कर्मचारी लोगों को खाना तभी दे रहे हैं जब वे 10 किलोमीटर दूर आकर फोटो खिंचवाते हैं। यानी राहत की थाली भी सिर्फ कैमरे की मौजूदगी में परोसी जा रही है। पीड़ितों का कहना है कि ऐसे हालात में दूर जाना मुमकिन नहीं और फोटो खिंचवाए बिना पूड़ी भी नहीं मिल रही।
गांव की महिलाएं कहती हैं कि कई दिनों से बच्चों को ठीक से खाना नहीं मिला। बाढ़ का पानी अभी भी उनके घरों में भरा है और ऊपर से सरकारी मदद का कोई नामोनिशान नहीं है। बुजुर्गों की तबीयत बिगड़ रही है लेकिन न डॉक्टर पहुंच रहे हैं और न दवाइयां मिल रही हैं।
सबसे चिंताजनक बात ये है कि मदद केवल कागजों तक सीमित है। कुछ जगहों पर दिखावे के लिए खाना बांटा जा रहा है, लेकिन ज़्यादातर इलाकों में लोग खुद से इंतज़ाम करने को मजबूर हैं। प्रशासन की ओर से राहत के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही है।
बांदा के हालात एक चेतावनी हैं कि प्राकृतिक आपदा के समय सरकारी सिस्टम की तैयारियां कितनी कमजोर हैं। पीड़ितों को अब भी इंतज़ार है कि कोई उन्हें वाकई मदद पहुंचाए – बिना शर्त, बिना फोटो और बिना राजनीति के।
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