हिंदी सिनेमा के ही-मैन कहे जाने वाले धर्मेंद्र को दुनिया भर में अपार लोकप्रियता मिली, लेकिन उनके योगदान के मुकाबले उन्हें बड़े संस्थागत सम्मान नहीं मिल पाए—यह बात उनके निधन के बाद एक बार फिर चर्चा में है। 24 नवंबर को 89 वर्ष की उम्र में उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर फैन्स का भावनात्मक उभार साफ दिखा। पुरानी तस्वीरों और अधूरी यादों के साथ लोगों ने यह प्रश्न भी उठाया कि छह दशक से अधिक के शानदार करियर के बाद भी धर्मेंद्र को न बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर मिला, न नेशनल अवॉर्ड और न ही भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया। यह विडंबना तब और गहरी दिखाई देती है जब हम देखते हैं कि राजकीय सम्मान के बिना उनका अंतिम संस्कार भी हुआ—जिसने प्रशंसकों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए।
धर्मेंद्र को 2012 में पद्म भूषण का सम्मान जरूर मिला था, लेकिन यह तथ्य चौंकाने वाला है कि बतौर अभिनेता उन्हें कभी फिल्मफेयर, नेशनल अवॉर्ड या फाल्के अवॉर्ड नहीं मिला। इंडस्ट्री में उनके बाद आए कई कलाकार ऐसे पुरस्कार हासिल कर चुके, जिनकी उनके करियर को शुरू करने, बढ़ाने या निर्देशित करने में भी धर्मेंद्र का योगदान रहा था। इसके बावजूद धर्मेंद्र का व्यक्तित्व हमेशा सहज, आत्मविश्वासी और मस्तमौला रहा। उन्होंने कभी अवॉर्ड्स की दौड़ में हिस्सा नहीं लिया और न ही सार्वजनिक रूप से किसी सम्मान की कमी पर सवाल उठाए। लेकिन उनके फैन्स के लिए यह सवाल हमेशा बना रहा कि भारतीय सिनेमा के इतने बड़े सुपरस्टार को आखिर क्यों इन महत्वपूर्ण सम्मानों से दूर रखा गया।
धर्मेंद्र के अभिनय की रेंज और विविधता का जिक्र किए बिना इस बहस को समझना अधूरा रहेगा। 60 और 70 के दशक में धर्मेंद्र के नाम से ही थिएटरों में भीड़ उमड़ पड़ती थी। गंभीर फिल्मों जैसे बंदिनी, सत्यकाम और अनुपमा में उनकी सादगी और गहराई देखने को मिलती है, तो दूसरी ओर शोले, चुपके-चुपके, धर्मवीर, रजिया सुल्तान और चरस जैसी फिल्मों में वे एक्शन, कॉमेडी और रोमांस की अलग-अलग दुनिया में धाक जमाते दिखते हैं। उनकी यह बहुआयामी प्रतिभा उन्हें उस दौर के किसी भी सुपरस्टार से अलग पहचान दिलाती है। यही वजह है कि प्रशंसकों का सवाल और गहरा हो जाता है—इतने व्यापक योगदान को आखिर सर्वोच्च पुरस्कार क्यों नहीं मिला?
पिछले कुछ वर्षों में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार जिन कलाकारों को दिया गया—जैसे शशि कपूर, मनोज कुमार, अमिताभ बच्चन, रजनीकांत, आशा पारेख, वहीदा रहमान, मिथुन चक्रवर्ती और हाल ही में मोहनलाल—उन सभी के साथ धर्मेंद्र का नाम अक्सर संभावित उम्मीदवारों में शामिल किया जाता रहा, लेकिन हर बार परिणाम कुछ और रहा। फैन्स का मानना है कि धर्मेंद्र भी उसी श्रेणी का सम्मान पाने वाले कलाकार थे, जिनकी लोकप्रियता, अभिनय और योगदान ने हिंदी सिनेमा के एक पूरे युग को प्रभावित किया।
हालांकि उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड्स की एक लंबी सूची मिली—1997 का फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट, 2005 का ज़ी सिने लाइफटाइम अचीवमेंट, 2007 का IIFA और 2008 का अप्सरा पुरस्कार—साथ ही 1991 में निर्माता के रूप में घायल को बेस्ट फिल्म का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। इसके बावजूद बतौर अभिनेता उन्हें बड़े सम्मान नहीं मिल सके। यही वजह है कि उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर एक ही बात सबसे ज्यादा गूंज रही है—धर्मेंद्र को उनकी कला के अनुरूप सर्वोच्च सम्मान क्यों नहीं मिला?
फैन्स का दर्द समझना कठिन नहीं है। धर्मेंद्र सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक पूरे दौर की पहचान थे—सादगी, आकर्षण, अभिनय और स्टारडम का अनोखा मेल। शायद इसी वजह से उनके प्रशंसकों के लिए यह प्रश्न हमेशा अधूरा रहेगा कि ऐसा कलाकार, जिसने लाखों दिलों पर राज किया, उसे भारतीय सिनेमा के शीर्ष सम्मान से आखिर क्यों वंचित रखा गया।
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