May 1, 2026

अमेरिका-रूस ऊर्जा सौदे पर चर्चा, भारत से तेल खरीद पर दिखाया गुस्सा

 

अमेरिका का दोहरा रवैया एक बार फिर सुर्खियों में है। एक तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए कठघरे में खड़ा कर दिया और भारतीय निर्यात पर 50% तक भारी-भरकम टैरिफ लगा दिया। यह टैरिफ 27 अगस्त से लागू हो गया है, जिसे ट्रंप ने इस महीने की शुरुआत में रूस से भारत की तेल खरीद को दंडित करने के तौर पर घोषित किया था। भारत पर इस कदम का सीधा असर यह होगा कि उसके कई निर्यात उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो जाएंगे और प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकते हैं।

 

लेकिन इसके ठीक उलट, अमेरिका खुद रूस के साथ ऊर्जा क्षेत्र में सौदों पर बातचीत कर रहा है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में मॉस्को और अलास्का में हुई बैठकों में दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने तेल, गैस और निवेश से जुड़े प्रस्तावों पर गंभीर चर्चा की। खास बात यह है कि ये बैठकें गुपचुप ढंग से की गईं और इनमें कई ऐसे प्रस्ताव रखे गए जिनसे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका रूस के साथ ऊर्जा संबंधों में फिर से नई शुरुआत करना चाहता है।

 

अमेरिका ने रूस के सामने कई शर्तें भी रखीं। पहली शर्त यह थी कि रूस के सखालिन-1 तेल और गैस प्रोजेक्ट में अमेरिकी कंपनी एक्सॉन मोबिल की दोबारा वापसी हो। यह प्रोजेक्ट रूसी सरकारी तेल कंपनी रोज़नेफ्ट से जुड़ा हुआ है। पहले भी इस दिशा में बातचीत हुई थी, लेकिन पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका। इसके अलावा अमेरिका ने रूस की LNG परियोजनाओं, विशेषकर आर्कटिक LNG-2, को उपकरण बेचने की बात भी की। यह कदम रूस को पश्चिमी प्रतिबंधों से राहत दिला सकता है और अमेरिका को आर्थिक रूप से रूस से जोड़ सकता है।

 

बातचीत में एक और अहम प्रस्ताव यह भी रखा गया कि अमेरिका रूस से परमाणु-संचालित आइसब्रेकर जहाज़ खरीदे। आर्कटिक क्षेत्र में तेल और गैस की ढुलाई के लिए इन जहाज़ों की जरूरत पड़ती है और यदि यह सौदा होता है तो अमेरिका और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग का नया अध्याय शुरू हो सकता है। वहीं, इन चर्चाओं को यूक्रेन शांति वार्ता से भी जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि अमेरिका ऐसे सौदों के जरिए रूस पर दबाव बनाना चाहता है ताकि वह शांति प्रक्रिया में शामिल हो सके।

 

फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से रूस लगभग पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा निवेश और बड़े करारों से कट चुका है। इस स्थिति को बदलने के लिए ही अमेरिका ने ये प्रस्ताव रखे हैं। हालांकि ट्रंप ने साफ कर दिया है कि अगर रूस उनकी शर्तों पर सहमत नहीं हुआ तो और भी कठोर प्रतिबंध लगाए जाएंगे। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि भारत पर टैरिफ लगाकर अमेरिका किसे संदेश देना चाहता है, जबकि वह खुद रूस के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की राह पर आगे बढ़ रहा है।

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