जानिए हॉर्मोनल असंतुलन के कारण, संकेत और बचाव के तरीके
हमारे शरीर में बने हॉर्मोन एक तरह के “केमिकल मैसेंजर” होते हैं, जो शरीर की लगभग हर प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। चाहे मूड हो, वजन हो, एनर्जी लेवल हो या पीरियड्स, हर चीज़ का सीधा संबंध हॉर्मोनल बैलेंस से होता है। लेकिन जब किसी वजह से इनका स्तर ज़रूरत से ज्यादा या कम हो जाता है, तो इसे हॉर्मोनल इम्बैलेंस कहा जाता है। यह समस्या धीरे-धीरे शरीर को प्रभावित करती है और अक्सर लोग इसे सामान्य तनाव, थकान या कमजोरी समझकर अनदेखा कर देते हैं। लेकिन समय रहते इसे पहचानना बहुत जरूरी है, क्योंकि यह आगे चलकर मानसिक, शारीरिक और प्रजनन स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है।
हॉर्मोनल इम्बैलेंस के कई कारण हो सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक गलत लाइफस्टाइल इसकी सबसे बड़ी वजह है। लगातार नींद की कमी, तनाव, प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा चीनी, कम एक्सरसाइज और मोटापा शरीर के हॉर्मोनल सिस्टम को बिगाड़ देते हैं। महिलाओं में यह समस्या पीसीओएस, प्रेग्नेंसी, मेनोपॉज़, थायरॉइड डिसऑर्डर और कई अन्य स्थितियों में ज्यादा देखने को मिलती है। वहीं अत्यधिक कैफीन, अल्कोहल, कुछ दवाओं का लम्बे समय तक सेवन और प्रदूषण में मौजूद BPA जैसे कैमिकल भी इस समस्या को बढ़ाते हैं। ऐसे में यदि शुरूआती संकेतों को समय पर पहचान लिया जाए, तो इसे आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
आरएमएल हॉस्पिटल की असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ. सलोनी चड्ढा बताती हैं कि शरीर कई संकेत देता है, जिन्हें अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। इसका सबसे आम लक्षण है लगातार थकान, भले ही आप पूरी नींद ले रहे हों। इसके अलावा वजन अचानक बढ़ना या तेजी से कम होना, पीरियड्स का अनियमित होना, चेहरे पर अचानक पिंपल्स बढ़ जाना और बालों का झड़ना या शरीर पर अनचाहे बाल उग आना हॉर्मोनल बदलाव का परिणाम हो सकता है। वहीं लगातार मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी, डिप्रेशन, नींद न आना, बार-बार भूख लगना, पाचन खराब होना और कामेच्छा में कमी भी इसके संकेत हैं। अगर ये लक्षण कई हफ्तों तक बने रहें, तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है।
हॉर्मोनल असंतुलन से बचने के लिए सबसे पहला कदम है लाइफस्टाइल में बदलाव। संतुलित डाइट, पर्याप्त नींद, योग, ध्यान और नियमित व्यायाम हॉर्मोन को बैलेंस रखने में मदद करते हैं। चीनी का सेवन कम करना, जंक फूड से दूरी और पानी की पर्याप्त मात्रा लेना भी बेहद फायदेमंद है। साथ ही प्लास्टिक कंटेनर की जगह स्टील या ग्लास का इस्तेमाल, स्क्रीन टाइम कम करना और तनाव को नियंत्रित करना भी शरीर के एंडोक्राइन सिस्टम को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक होता है।
अगर आप अपने शरीर में ऊपर बताए गए संकेत महसूस कर रहे हैं, तो इसे हल्के में ना लें। सही समय पर जांच और उपचार से यह समस्या पूरी तरह नियंत्रित की जा सकती है और आप स्वस्थ जीवनशैली की ओर लौट सकते हैं।
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