सीमा पर गोलीबारी के बाद पंजशीर से 1,500 कमांडो हटाकर बॉर्डर पर भेजे; अमेरिका, चीन और रूस भी समीकरण में
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच पिछले कई महीनों से चल रहा तनाव अब एक बार फिर चरम पर पहुंचता दिख रहा है। शुक्रवार देर रात दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई सीमा पर गोलीबारी ने दो महीने से चल रहे नाज़ुक युद्धविराम को ध्वस्त कर दिया है। इस बीच अफगानिस्तान के भीतर से बड़ी खबर आई है कि तालिबान ने पाकिस्तान के साथ संभावित संघर्ष को ध्यान में रखते हुए अपनी सैन्य तैयारियों को तेज कर दिया है। सूत्रों का कहना है कि तालिबान शासन ने पंजशीर से अपने 1,500 से अधिक प्रशिक्षित लड़ाकों को हटाकर कंधार, हेलमंद और जाबुल जैसे संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में तैनात कर दिया है।
अफगानिस्तान इंटरनेशनल के सूत्रों के मुताबिक तालिबान जिन लड़ाकों को पंजशीर से स्थानांतरित कर रहा है, वे विशेष कमांडो यूनिट्स हैं, जिन्हें अमेरिकी सेना के समय से ही उन्नत प्रशिक्षण मिला था। इन कमांडो समूहों को सीमा पर तैनात करने का उद्देश्य पाकिस्तान को यह कड़ा संदेश देना है कि अगर इस्लामाबाद ने किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई की कोशिश की, तो तालिबान मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है। तालिबान के एक वरिष्ठ कमांडर के अनुसार, यह तैनाती केवल रक्षा नहीं बल्कि रणनीतिक दबाव की एक सोची-समझी पहल है।
तालिबान की बढ़ती तैयारी के पीछे उसका विशाल सैन्य जखीरा भी बड़ा कारण है, जो अमेरिका की अफगानिस्तान से 2021 की वापसी के बाद उसके हाथ लग गया। तालिबान के पास लगभग 78 अमेरिकी एयरक्राफ्ट, 40,000 से अधिक सैन्य वाहन, तीन लाख से ज्यादा आधुनिक हथियार और सोवियत काल के कई टैंक मौजूद हैं, जिन्हें हाल में फिर से चालू किया गया है। यह वही उपकरण हैं जिन्हें लेकर अमेरिका में राजनीतिक विवाद जारी है। डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में आरोप लगाया कि बाइडन प्रशासन ने 7 बिलियन डॉलर के हथियार तालिबान के लिए “छोड़” दिए और अब वे इन्हें वापस मांग रहे हैं। हालांकि तालिबान का जवाब साफ है—ये अफगानिस्तान की राष्ट्रीय संपत्ति है और वापस नहीं की जाएगी।
उधर पाकिस्तान-तालिबान रिश्ते पिछले एक साल में लगातार बिगड़ते गए हैं। पाकिस्तान अफगानिस्तान पर लगातार आरोप लगाता रहा है कि टीटीपी (पाकिस्तानी तालिबान) को अफगान शरण दी जा रही है, जबकि तालिबान इन आरोपों से इनकार करता है। सीमा पर लगातार गोलीबारी, पाकिस्तानी ड्रोन हमलों के आरोप और अफगान अफसरों की प्रतिक्रिया ने हालात को और विस्फोटक बना दिया है। तालिबान का मानना है कि पाकिस्तान की हर बड़ी सैन्य गतिविधि अमेरिका के इशारे पर हो सकती है, इसलिए उसने अपनी रणनीति बहुआयामी कर दी है। सूत्रों के अनुसार तालिबान अब रूस और चीन से भी सामरिक और आर्थिक सहयोग की उम्मीद कर रहा है।
इस पूरे विवाद से अलग, तालिबान ने अफगानिस्तान के विशाल मिनरल रिज़र्व—विशेष रूप से लिथियम—को अपनी दीर्घकालिक रणनीति का केंद्र बना लिया है। अफगानिस्तान के पास 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के खनिज मौजूद हैं और तालिबान इन्हें अपने आर्थिक भविष्य के रूप में देख रहा है। चीन पहले ही इस क्षेत्र में भारी निवेश कर चुका है, जबकि रूस और अमेरिका भी अफगानिस्तान के लिथियम पर नजर रखे हुए हैं। तालिबान की नई रणनीति “लड़ाई नहीं, लिथियम डिप्लोमेसी” इसी वजह से चर्चा में है। लेकिन जब सीमा पर तनाव इतना बढ़ गया हो, तो यह कूटनीति कितनी सफल होगी, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट हो पाएगा।
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