April 17, 2026

CAG रिपोर्ट: रेलवे कोचों में पानी की भारी कमी, एक साल में मिलीं 1 लाख से ज्यादा शिकायतें

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में भारतीय रेलवे की सफाई व्यवस्था और कोचों में पानी की उपलब्धता को लेकर गंभीर खामियों की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2022-23 में यात्रियों ने शौचालयों और वॉश बेसिन में पानी की कमी को लेकर एक लाख से भी ज्यादा शिकायतें दर्ज कराईं। इनमें से लगभग 33 हजार मामलों में समस्या को हल करने में काफी लंबा समय लगा। यह रिपोर्ट 2018-19 से लेकर 2022-23 तक लंबी दूरी की ट्रेनों में सफाई और स्वच्छता की स्थिति का आकलन करती है।

 

CAG ने बताया कि कई बार वाटरिंग स्टेशनों पर कोचों में पर्याप्त पानी नहीं भरा जाता, जिसकी वजह से यात्रियों को असुविधा होती है। इस समस्या को दूर करने के लिए रेलवे बोर्ड ने क्विक वॉटरिंग अरेंजमेंट (QWA) की योजना बनाई थी। मार्च 2023 तक 109 स्टेशनों में से 81 पर QWA की व्यवस्था हो गई, लेकिन नौ जोनों के 28 स्टेशनों पर इसे लागू करने में दो से चार साल तक की देरी हुई। रिपोर्ट में इस देरी की वजह फंड की कमी, ठेकेदारों द्वारा धीमी गति से काम करना या काम को बीच में रोक देना बताया गया है।

 

यात्रियों की संतुष्टि पर कराए गए एक सर्वे में भी निराशाजनक आंकड़े सामने आए। लंबी दूरी की 96 ट्रेनों के 2,426 यात्रियों से लिए गए फीडबैक में कई जोनों में सफाई व्यवस्था को लेकर असंतोष पाया गया। सिर्फ पांच जोनों में 50 प्रतिशत से अधिक यात्री संतुष्ट मिले, जबकि दो जोनों में संतुष्टि का स्तर 10 प्रतिशत से भी कम रहा। खासकर बायो-टॉयलेट की सफाई को लेकर शिकायतें सबसे ज्यादा रहीं।

 

रिपोर्ट ने यह भी खुलासा किया कि रेलवे का सफाई पर होने वाला खर्च अक्सर निर्धारित बजट से कहीं ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर दक्षिणी रेलवे ने अपने फाइनल बजट ग्रांट से 100 प्रतिशत ज्यादा और उत्तर मध्य रेलवे ने 141 प्रतिशत से भी अधिक खर्च किया। लिनेन मैनेजमेंट में भी लगभग सभी जोनों ने बजट से ज्यादा खर्च किया, हालांकि कोविड महामारी के दौरान कुछ जोनों ने अपने बजट का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाए।

 

इसके अलावा, ऑटोमैटिक कोच वॉशिंग प्लांट्स (ACWPs) का भी सही इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। 24 प्लांट्स में से आठ खराब पड़े थे, जिसके चलते लाखों कोचों की धुलाई मैकेनाइज्ड क्लीनिंग कॉन्ट्रैक्ट्स के ज़रिए कराई गई। वहीं क्लीन ट्रेन स्टेशन (CTS) योजना भी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, क्योंकि 10-15 मिनट के ठहराव में पूरी सफाई करना संभव नहीं हो पाता। इससे मशीनों और स्टाफ का सही उपयोग नहीं हो पाता और खर्चा बढ़ जाता है।

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