क्या ‘महंगाई सुनामी’ ला रहे हैं ट्रंप? अमेरिका में बढ़ी खरीददारी की होड़, नागरिक बोले – अभी नहीं लिया तो फिर नहीं ले सकेंगे!
अमेरिका में एक अजीब सी बेचैनी देखी जा रही है। लोग जरूरत का सामान, खासकर महंगे इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स, ऐसे खरीद रहे हैं जैसे कोई संकट सिर पर मंडरा रहा हो – और वाकई, यह संकट टैरिफ के रूप में सामने आ रहा है।
पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा विभिन्न देशों पर भारी-भरकम टैरिफ लगाने की घोषणा ने न केवल वैश्विक व्यापार को झकझोर दिया है, बल्कि अमेरिका की घरेलू अर्थव्यवस्था में भी चिंता की लहर दौड़ा दी है। यह कदम, जो विश्व स्तर पर व्यापार संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर पेश किया गया, अब खुद अमेरिकी नागरिकों के लिए परेशानी का सबब बन गया है।
ऑस्टिन के जॉन ने क्यों बदली अपनी योजना?
टेक्सास के ऑस्टिन में रहने वाले जॉन गुटेरेज पेशे से एक फोटोग्राफर हैं। वे काफी समय से एक हाई-स्टोरेज लैपटॉप खरीदने की सोच रहे थे, लेकिन कीमतों में संभावित बढ़ोतरी की खबर सुनते ही उन्होंने अपनी योजना तुरंत लागू कर दी और लैपटॉप खरीद लिया। जॉन अकेले नहीं हैं – हजारों अमेरिकी अब इसी रणनीति पर चल रहे हैं: “अभी खरीदो, वरना कल दुगना चुकाओ।”
टैरिफ का असर – क्या ट्रंप की रणनीति उलटी पड़ रही है?
ट्रंप प्रशासन का दावा था कि इन टैरिफ के ज़रिए विदेशी कंपनियों पर दबाव बनाया जाएगा कि वे अमेरिका में अपने प्रोडक्शन प्लांट लगाएं या अमेरिकी सामान के लिए अपने बाजार खोलें। पर हकीकत ये है कि फिलहाल अमेरिका के आम लोग ही इसकी पहली मार झेलते दिख रहे हैं।
ताइवान पर 32% टैरिफ लगाने की घोषणा ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। अमेरिका में बिकने वाले कई प्रमुख लैपटॉप और स्मार्टफोन ताइवानी कंपनियों द्वारा अमेरिका के बाहर बनाए जाते हैं। इसका मतलब है – जब ये सामान अमेरिकी बाजार में आएंगे, तो टैरिफ के कारण उनकी कीमतें आसमान छू सकती हैं।
लोगों की जुबान पर एक ही बात – “अब नहीं तो कभी नहीं”
बाजारों में अचानक आई भीड़, इलेक्ट्रॉनिक्स स्टोर्स में लंबी कतारें और ऑनलाइन ऑर्डर में बढ़ोतरी इस बात का संकेत हैं कि अमेरिका की जनता अब इस कदम को लेकर गंभीर है। जहां सरकार इसे एक व्यापारिक ‘स्ट्रैटेजी’ के रूप में देख रही है, वहीं आम नागरिक इसे अपनी जेब पर सीधा हमला मान रहे हैं।
महंगाई की इस आशंका ने कई लोगों को अपनी जरूरतें समय से पहले पूरी करने पर मजबूर कर दिया है। कई घरों में अब पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, फर्नीचर और रोजमर्रा की चीजों की अतिरिक्त खरीदारी की जा रही है।
क्या ट्रंप का दांव उलटा पड़ेगा?
यह सवाल अब चर्चा का केंद्र बन गया है। क्या टैरिफ वाकई अमेरिका के लिए लाभदायक साबित होंगे या फिर यह महज एक राजनीतिक चाल थी जिसका भार आम नागरिकों को उठाना पड़ेगा?
फिलहाल जो स्पष्ट है, वह है अमेरिकी नागरिकों की बढ़ती चिंता और उनकी बढ़ती खरीददारी – मानो यह तय हो गया हो कि टैरिफ का दौर एक ‘महंगाई सुनामी’ बनकर आने वाला है।
क्या यह डर वाजिब है, या सिर्फ एक भ्रम? और क्या अमेरिका सचमुच खुद को महंगाई के दलदल में धकेल रहा है – जानना अभी बाकी है। लेकिन जनता ने तो साफ कर दिया है – जब तक कीमतें हाथ में हैं, तब तक चीज़ें भी हाथ में होनी चाहिए!
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