उत्तर प्रदेश में लागू होगा ‘एक तिथि, एक त्योहार’ का नियम, काशी विद्वत परिषद ने तैयार की रूपरेखा
उत्तर प्रदेश में लागू होगा ‘एक तिथि, एक त्योहार’ का नियम, काशी विद्वत परिषद ने तैयार की रूपरेख
उत्तर प्रदेश में अब त्योहारों और व्रतों की तिथियों को लेकर किसी भी प्रकार का मतभेद नहीं रहेगा। प्रदेश के पंचांग को एकरूपता प्रदान करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने जानकारी दी कि प्रदेश का पंचांग तैयार करने के लिए काशी के विद्वानों के साथ ही प्रदेश के प्रमुख पंचांगकारों की एक टीम गठित की गई है। यह टीम अगले वर्ष की कालगणना, तिथि और पर्व का सटीक निर्धारण करके ‘एक तिथि, एक त्योहार’ और ‘एक पंचांग’ के सिद्धांत पर इसे तैयार करेगी।
2026 से लागू होगा एकरूप पंचां
पिछले दिनों काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में आयोजित ज्योतिष सम्मेलन में प्रदेश के प्रमुख पंचांगकारों की सहमति के बाद यह निर्णय लिया गया। यह एकरूप पंचांग संवत 2083, यानी 2026-27 के लिए तैयार किया जाएगा और इसके प्रकाशन की जिम्मेदारी अन्नपूर्णा मठ मंदिर उठाएगा। यह पहली बार होगा जब पूरे प्रदेश में त्योहारों की तिथियों को लेकर कोई भ्रम या मतभेद नहीं रहेगा।
काशी के पंचांगों में पहले ही हो चुकी है एकरूपता
काशी हिंदू विश्वविद्यालय, काशी विद्वत परिषद और काशी के पंचांगकारों के सहयोग से पहले ही काशी में विभिन्न पंचांगों के बीच मौजूद मतभेद को दूर किया जा चुका है। चैत्र प्रतिपदा से इसकी शुरुआत हुई थी, जिसके अंतर्गत BHU से बनने वाला विश्वपंचांग, ऋषिकेश पंचांग, महावीर पंचांग, गणेश आपा पंचांग, आदित्य पंचांग और ठाकुर प्रसाद पंचांग को एकरूप किया गया। तीन वर्षों की मेहनत के बाद यह संभव हो सका और अब यही मॉडल पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा।
त्योहारों की तिथियों में नहीं रहेगा कोई अंत
इस निर्णय के लागू होने के बाद प्रदेश में मनाए जाने वाले विभिन्न प्रमुख त्योहारों की तिथियों में एकरूपता आ जाएगी। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित पर्व और व्रत शामिल हैं:
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, नवरात्र, रामनवमी, अक्षय तृतीया, गंगा दशहरा, रक्षाबंधन, श्रावणी, जन्माष्टमी, पितृपक्ष, महालया, विजयादशमी, दीपावली, अन्नकूट, नरक चतुर्दशी, भैया दूज, धनतेरस, कार्तिक एकादशी, देव दीपावली, शरद पूर्णिमा, सूर्य षष्ठी, खिचड़ी और होली।
अब तक विभिन्न पंचांगों में तिथियों के निर्धारण में मतभेद के कारण त्योहार अलग-अलग दिनों में मनाए जाते थे, जिससे समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती थी। इस नए नियम के बाद पूरे प्रदेश में एक ही तिथि पर सभी त्योहार मनाए जाएंगे।
समाज में फैले भ्रम को दूर करने की पहल
BHU के ज्योतिष विभाग के प्रो. विनय पांडेय के अनुसार, पंचांगों की एकरूपता से समाज के बीच उत्पन्न होने वाले भ्रम को दूर किया जा सकेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि त्योहारों के निर्धारण में सिर्फ ‘उदया तिथि’ ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि विभिन्न पर्वों के लिए अलग-अलग काल गणना का महत्व होता है। उदाहरण के लिए:
राम नवमी – मध्याह्नव्यापिनी तिथि
दीपावली – प्रदोषव्यापिनी तिथि
शिवरात्रि और जन्माष्टमी – अर्धरात्रि व्यापिनी तिथि
इसलिए, सामान्य व्रत पर्वों को छोड़कर अन्य प्रमुख पर्वों का निर्धारण विशेष कालखंड के आधार पर किया जाएगा, जिससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी अपनाया जा सकेगा।
प्रदेशभर में लागू होगा यह नियम
अब काशी के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में पंचांग को एकरूप करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। 2026 में पूरे प्रदेश के लिए ‘एक तिथि, एक त्योहार’ वाला पंचांग प्रकाशित किया जाएगा, जिसे नवसंवत्सर के अवसर पर जनता के लिए लोकार्पित किया जाएगा। इससे व्रत, पर्व, तिथि और त्योहारों के निर्धारण में आने वाले मतभेद पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशानुसार काशी विद्वत परिषद ने इस प्रस्ताव की रूपरेखा तैयार कर ली है और इसे 7 अप्रैल को मुख्यमंत्री को प्रस्तुत किया जाएगा।
बनारस से प्रकाशित पंचांग बनेगा आधार
इस नए नियम के तहत बनारस से प्रकाशित पंचांग को पूरे प्रदेश में मान्यता दी जाएगी और इसी के आधार पर प्रदेश के व्रत, पर्व और अवकाश का निर्धारण होगा। यह निर्णय धार्मिक और सामाजिक समरसता को बढ़ाने के लिए लिया गया है, जिससे पूरे उत्तर प्रदेश में त्योहारों की तिथियों को लेकर किसी भी प्रकार की भिन्नता समाप्त हो जाए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशन में काशी विद्वत परिषद और प्रदेश के प्रमुख पंचांगकार इस दिशा में कार्य कर रहे हैं और इसकी शुरुआत भी हो चुकी है!
‘एक तिथि, एक त्योहार’ का यह नियम न केवल धार्मिक व्यवस्था को सुचारू बनाएगा, बल्कि इससे प्रशासनिक कार्यों में भी सरलता आएगी। अब प्रदेशवासियों को अलग-अलग पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि पूरे उत्तर प्रदेश में एक ही मानक पंचांग लागू किया जाएगा। यह ऐतिहासिक पहल समाज में एकरूपता और धार्मिक समरसता लाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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