उत्तर प्रदेश में तिल की खेती को बढ़ावा दे रही योगी सरकार, वैज्ञानिक तरीकों से बढ़ रही किसानों की आमदनी
लखनऊ, 24 जुलाईः उत्तर प्रदेश सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में एक और ठोस कदम उठा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार तिल की खेती को प्रोत्साहित कर रही है, जिससे न सिर्फ किसानों को पोषक फसल की तरफ आकर्षित किया जा रहा है, बल्कि उन्हें वैज्ञानिक खेती के जरिए अधिक उत्पादन और लाभ भी सुनिश्चित कराया जा रहा है। खरीफ सीजन में प्रदेश के लगभग पांच लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में तिल की खेती की जाती है, और इस वर्ष सरकार ने बीज पर 95 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से अनुदान देना शुरू किया है।
तिल की खेती मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में की जाती है जहां जलभराव की समस्या नहीं होती और वर्षा कम होती है। उत्तर प्रदेश में कई ऐसे क्षेत्र हैं जो असमतल और सूक्ष्म सिंचाई के योग्य हैं, वहां तिल की खेती एक लाभकारी विकल्प बनकर उभरी है। कृषि विभाग की मानें तो पारंपरिक तरीकों की अपेक्षा वैज्ञानिक विधि से तिल की खेती करने पर उपज दोगुनी हो सकती है। परंपरागत पद्धति से जहां 4-6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है, वहीं वैज्ञानिक विधि अपनाने पर 8-12 क्विंटल उपज ली जा सकती है। इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य 9846 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है, जिससे किसानों को एक लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक की आमदनी संभव है।
सरकार न केवल बीज पर अनुदान दे रही है, बल्कि किसानों को प्रशिक्षण भी प्रदान कर रही है ताकि वे बीज उपचार, खरपतवार नियंत्रण, रोग व कीट प्रबंधन और सिंचाई जैसी तकनीकों का कुशलतापूर्वक उपयोग कर सकें। कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित प्रमुख प्रजातियों में आरटी-346, आरटी-351, एमटी-2013-3 और बीयूएटी तिल-1 शामिल हैं। साथ ही, किसान थिरम या ट्राइकोडर्मा जैसे जैविक कीटनाशकों से बीज उपचार कर बीजों की गुणवत्ता बढ़ा सकते हैं। फूल आने व दाना भरने की अवस्था में सिंचाई, रोग नियंत्रण के लिए थायोफेनेट मिथाइल या मैनकोजेब जैसे रसायनों का उपयोग करना फसल की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
तिल न केवल किसानों के लिए लाभकारी फसल है बल्कि यह पोषण और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है। तिल में प्रोटीन, वसा, कैल्शियम, आयरन, जिंक और कई विटामिन्स मौजूद होते हैं। इसके अलावा इसमें कोलेस्ट्रॉल शून्य होता है, जिससे यह हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। चिकित्सक भी अब प्रतिदिन तिल और तिल तेल के सेवन की सलाह देने लगे हैं, क्योंकि यह रक्तचाप, रक्त शर्करा और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में लाभकारी साबित हो रहा है।
तिल की खेती के लिए गर्म और शुष्क जलवायु तथा अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट भूमि उपयुक्त मानी जाती है। बुवाई के लिए जुलाई के अंत तक का समय उत्तम होता है। कतार से कतार की दूरी 30-45 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेमी रखकर अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है।
कुल मिलाकर, तिल की खेती किसानों के लिए एक लाभदायक विकल्प बनती जा रही है। सरकार की पहल, तकनीकी मार्गदर्शन और समर्थन मूल्य के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि किसान कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकें और प्रदेश की कृषि व्यवस्था को मजबूती मिले।
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