April 30, 2026

थैलेसीमिया: क्या होती है ये बीमारी और क्यों बार-बार चढ़ाना पड़ता है खून

थैलेसीमिया एक गंभीर जेनेटिक यानी आनुवांशिक बीमारी है, जो शरीर में हीमोग्लोबिन बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है। हीमोग्लोबिन हमारे लाल रक्त कणों (Red Blood Cells) में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण प्रोटीन है, जो शरीर के हर हिस्से तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। जब शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता, तो खून की कमी यानी एनीमिया हो जाती है। इस बीमारी में लाल रक्त कण जल्दी टूट जाते हैं, जिससे मरीज को कमजोरी, थकान और सांस फूलने जैसी समस्याएं होती हैं।

थैलेसीमिया दो प्रकार का होता है — थैलेसीमिया माइनर और थैलेसीमिया मेजर। माइनर प्रकार में लक्षण हल्के होते हैं और मरीज सामान्य जीवन जी सकता है, जबकि मेजर प्रकार बेहद गंभीर होता है। थैलेसीमिया मेजर उन बच्चों को होता है, जिनके मां और पिता दोनों के खून में यह दोषपूर्ण जीन मौजूद होता है। दक्षिण एशियाई देशों जैसे भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में यह बीमारी ज्यादा देखी जाती है।

डॉक्टरों के अनुसार, इस बीमारी के लक्षण बचपन से ही दिखने लगते हैं। इसमें बच्चे की त्वचा पीली पड़ जाती है, कमजोरी बनी रहती है, भूख कम लगती है और हड्डियों का आकार बढ़ने लगता है। साथ ही, स्प्लीन (तिल्ली) और लिवर का आकार भी बढ़ सकता है। अगर समय पर इलाज न मिले, तो बच्चे का विकास रुक जाता है और स्थिति जानलेवा भी हो सकती है। इसलिए, समय पर इसकी पहचान और उपचार बेहद जरूरी है।

आरएमएल अस्पताल के डॉ. सुभाष गिरी बताते हैं कि थैलेसीमिया मेजर के मरीज का शरीर खुद से पर्याप्त रेड ब्लड सेल्स नहीं बना पाता, इसलिए उन्हें हर 2 से 4 हफ्तों में ब्लड ट्रांसफ्यूज़न (खून चढ़ाना) पड़ता है। इससे शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य बना रहता है और ऑक्सीजन की कमी नहीं होती। हालांकि, लगातार ब्लड ट्रांसफ्यूज़न से शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे दिल, लिवर और अन्य अंगों को नुकसान हो सकता है।

इस समस्या को कंट्रोल करने के लिए मरीज को आयरन चिलेशन थेरेपी दी जाती है, जो शरीर से अतिरिक्त आयरन को बाहर निकालने में मदद करती है। वहीं, बोन मैरो ट्रांसप्लांट इस बीमारी का एकमात्र स्थायी इलाज माना जाता है, लेकिन यह तभी संभव है जब डोनर और मरीज का मैच पूरी तरह सही हो।

डॉक्टर सलाह देते हैं कि थैलेसीमिया की जांच शादी से पहले या गर्भावस्था के शुरुआती चरण में जरूर करवानी चाहिए। अगर परिवार में किसी को यह बीमारी है, तो नियमित ब्लड टेस्ट कराते रहें। साथ ही, बिना डॉक्टर की सलाह के आयरन सप्लीमेंट कभी न लें। पौष्टिक आहार, हरी सब्जियों और पर्याप्त पानी का सेवन करें। मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए तनाव कम रखें और पॉजिटिव जीवनशैली अपनाएं — क्योंकि थैलेसीमिया के साथ भी जीवन जीना संभव है, बस सही इलाज और देखभाल जरूरी है।

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