तुर्किए की अर्थव्यवस्था पर भारी ‘छिपा खजाना’, सरकार की पहुंच से दूर 266 लाख करोड़ का सोना!
तुर्किए की अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट से जूझ रही है, लेकिन इस संकट की तह में एक ऐसा रहस्य छिपा है जिसे सरकार चाहकर भी सुलझा नहीं पा रही — वो है देश के आम लोगों के घरों में छिपा वह ‘सोने का खजाना’ जो न तो बैंकिंग सिस्टम में है और न ही टैक्स के दायरे में। तकिए के नीचे छिपे इस सोने की कीमत लगभग 311 अरब डॉलर यानी करीब 2665442 करोड़ रुपए आँकी गई है, जो देश के केंद्रीय बैंक के गोल्ड रिजर्व से भी कई गुना ज़्यादा है।
दरअसल, तुर्किए में लंबे समय से एक सांस्कृतिक परंपरा रही है — ‘अंडर द पिलो सेविंग्स’। लोग अपने गहनों, सोने की ईंटों और सिक्कों को बैंकों में जमा करने के बजाय घर में ही सुरक्षित रखते हैं। यह सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि देश के नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा का एक व्यक्तिगत तंत्र है। जैसे-जैसे देश में महंगाई और मुद्रा संकट बढ़ा, वैसे-वैसे लोगों ने औपचारिक बैंकिंग सिस्टम से दूरी बनाकर सोने को अपने घरों में संचित करना बेहतर समझा। यही वजह है कि 2023 तक तुर्किए सोने के आभूषणों की खपत में दुनिया में चौथे स्थान पर रहा — चीन, भारत और अमेरिका के बाद।
आर्थिक अस्थिरता के बीच यह चलन और भी तेज़ हो गया। वर्ष 2022 में जब महंगाई दर 85% तक पहुंच गई और लीरा की वैल्यू तेजी से गिरी, तो लोगों ने गहनों की बजाय सोने के सिक्के और बिस्कुट खरीदना शुरू किया। इनका आदान-प्रदान आसान होता है और निवेश के लिहाज से भी ज्यादा मुफीद माने जाते हैं। मगर सरकार के लिए यह समस्या बन गया है, क्योंकि यह सोना किसी भी आर्थिक आपातकाल में राष्ट्रीय स्तर पर उपयोग में नहीं लाया जा सकता।
बैंकिंग सिस्टम से इस दूरी की एक बड़ी वजह टैक्स भी है। तुर्किए में बैंकों में जमा रकम पर टैक्स लगता है और ट्रांजैक्शन की निगरानी होती है। वहीं, घर में रखा सोना टैक्स से सुरक्षित रहता है। मार्च 2025 में जब सरकार ने बैंकों के ज़रिए सोने की खरीद पर 0.2% टैक्स लगाया, तो लोगों ने और भी ज़्यादा निजी जूलर्स और नकद लेन-देन का रुख कर लिया।
इसी समस्या को हल करने के लिए सरकार ने कई सख्त कदम उठाए हैं। अब 5274 डॉलर से ऊपर की जूलरी खरीद पर पहचान पत्र दिखाना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके अलावा बिना सर्टिफिकेट वाले गोल्ड बार की बिक्री पर भी रोक लगा दी गई है। लेकिन इन प्रयासों के बावजूद बैंकिंग सिस्टम में सोना लाने की सरकारी मुहिम अब तक सफल नहीं हो सकी है।
यह कोई पहली बार नहीं है जब तुर्किए सरकार ने इस ‘छिपे खजाने’ को बाहर निकालने की कोशिश की हो। 1980 के दशक में प्रधानमंत्री तुर्गुत ओजाल ने इसकी पहल की थी, जिसे जनता के विश्वास के अभाव में ज़्यादा सफलता नहीं मिली। 2016 में राष्ट्रपति एर्दोआन ने भी लोगों से आग्रह किया कि वे घर में रखा डॉलर और सोना बैंक में जमा करें। इसके बाद 2022 में ‘गोल्ड कन्वर्जन सिस्टम’ लाया गया, जिससे लोग अधिकृत जूलर्स के माध्यम से सोना बैंक में जमा कर सकते थे।
लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इन सभी योजनाओं की विफलता का कारण केवल एक है — विश्वास की कमी। लोग मानते हैं कि बैंकिंग सिस्टम में बार-बार नीति बदलने, ब्याज दरों और टैक्स को लेकर अनिश्चितता के चलते उनका निजी खजाना सुरक्षित नहीं रहेगा। इसलिए जब संकट आता है, तो लोग अपने इसी छिपे हुए सोने को बेचकर गुजर-बसर करते हैं, और हालात सुधरते ही दोबारा इसे चुपचाप जमा कर लेते हैं — बिना सरकार को खबर दिए।
यह छिपा खजाना, जिसे तुर्किए के साइलेंट इकॉनॉमिक बैलेंस के रूप में देखा जा रहा है, अब सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। क्योंकि जब देश का चालू खाता घाटा 20.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया है और विदेशी मुद्रा भंडार सीमित होता जा रहा है, तब इतनी बड़ी राशि बैंकों के बाहर होना तुर्किए की नीतियों को खुली चुनौती दे रहा है।
तुर्किए के लिए असली संकट अब यह है कि क्या वह इस सुनहरी परंपरा को राष्ट्रीय निवेश में बदल सकेगा — या फिर यह खजाना हमेशा तकिए के नीचे ही छिपा रहेगा?
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