सुप्रीम कोर्ट में SIR प्रक्रिया से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान आधार कार्ड की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल उठे। अदालत ने कहा कि आधार कार्ड नागरिकता या वोटिंग अधिकार का प्रमाण नहीं है, इसलिए सिर्फ आधार होने से किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने चिंता जताई कि कई घुसपैठियों के पास भी आधार कार्ड हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या सिर्फ इस दस्तावेज़ के आधार पर उन्हें वोट देने का अधिकार मिल जाना चाहिए। अदालत ने साफ किया कि आधार केवल सरकारी योजनाओं के लाभ तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है, न कि नागरिकता साबित करने के लिए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट सत्यापन का पूर्ण अधिकार है। आयोग आवेदन फॉर्म-6 के साथ जमा किए गए दस्तावेज़ों की जांच कर यह तय कर सकता है कि नाम जोड़ा जाए या नहीं। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग कोई “पोस्ट ऑफिस” नहीं है, बल्कि उसे हर दस्तावेज़ की वैधता की पड़ताल करनी होगी। पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आयोग से 1 दिसंबर तक जवाब मांगा गया है।
सुनवाई में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने SIR प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया आम नागरिकों पर अनावश्यक बोझ डाल रही है, खासकर उन वोटरों पर जो पढ़-लिख नहीं सकते। सिब्बल ने तर्क दिया कि आधार कार्ड भले ही नागरिकता का पूर्ण प्रमाण न हो, लेकिन यह व्यक्ति के देश में रहने का मजबूत संकेत जरूर देता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि गलत तरीके से फॉर्म भरने या प्रक्रिया न समझने के कारण नाम हटाए जाते हैं, तो यह आम लोगों के अधिकारों का हनन होगा। अदालत ने यह भी माना कि मृत वोटरों के नाम हटाना चुनाव आयोग का दायित्व है, लेकिन पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए।
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