April 22, 2026

राष्ट्रपति मुर्मु ने SC से पूछा – क्या सुप्रीम कोर्ट विधेयकों पर फैसला लेने की डेडलाइन तय कर सकता है?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल के फैसले पर जताई आपत्ति

फैसले में राज्यपालों और राष्ट्रपति को विधेयकों पर तय समय में निर्णय देने को कहा गया था

राष्ट्रपति ने अदालत से 14 संवैधानिक सवाल पूछे

उन्होंने अनुच्छेद 200 और 201 की व्याख्या पर पुनर्विचार की मांग की

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट तौर पर यह जानना चाहा है कि क्या न्यायालय संविधान के तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर निर्णय लेने की समय-सीमा निर्धारित कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यपालों और राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर निर्णय लेने के निर्देश पर आपत्ति जताते हुए राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से 14 संवैधानिक सवाल पूछे हैं।

पृष्ठभूमि: सुप्रीम कोर्ट का 8 अप्रैल का फैसला
8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा था कि जब कोई विधेयक राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए जाता है, तो उसे 3 महीने के भीतर उस पर निर्णय लेना अनिवार्य होगा। साथ ही, यदि कोई विधेयक दूसरी बार विधानसभा से पारित होकर आता है, तो उसे एक महीने के भीतर स्वीकृति देनी होगी। इसी तरह, यदि कोई विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, तो उन्हें भी तीन महीने में निर्णय लेना होगा।

राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछे 14 सवाल
राष्ट्रपति मुर्मु ने इस फैसले पर सवाल खड़े करते हुए सुप्रीम कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 की व्याख्या पर स्पष्टीकरण मांगा है। उनका कहना है कि संविधान में इन अनुच्छेदों के तहत राज्यपालों और राष्ट्रपति के पास विधेयकों पर विचार करने के लिए कोई तय समय सीमा नहीं दी गई है, फिर न्यायपालिका इसमें कैसे हस्तक्षेप कर सकती है?

प्रमुख सवाल जो राष्ट्रपति ने उठाए:

1. राज्यपाल के विकल्प: जब कोई विधेयक राज्यपाल के पास प्रस्तुत किया जाता है, तो उनके पास क्या संवैधानिक विकल्प उपलब्ध हैं?

2. न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा: क्या सुप्रीम कोर्ट संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों में हस्तक्षेप कर सकता है, जबकि संविधान स्वयं राज्यपाल और राष्ट्रपति को पूर्ण अधिकार देता है?

3. मंत्रिपरिषद की सलाह का महत्व: क्या राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत निर्णय लेने में मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य हैं?

4. संवैधानिक विवेक: क्या राज्यपाल को दिए गए संवैधानिक विवेक का प्रयोग न्यायोचित है और क्या वह स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकते हैं?

5. अनुच्छेद 361 और न्यायिक समीक्षा: क्या अनुच्छेद 361 के तहत राज्यपाल के निर्णयों पर न्यायिक समीक्षा पूरी तरह से प्रतिबंधित है?

6. न्यायिक आदेशों के माध्यम से समय-सीमा: क्या न्यायालय संविधान में निर्धारित समय-सीमा के अभाव में समयसीमा निर्धारित कर सकता है?

7. अनुच्छेद 143 का प्रयोग: क्या राष्ट्रपति को अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेना आवश्यक है?

8. कानून बनने से पूर्व न्यायिक हस्तक्षेप: क्या अदालत किसी विधेयक के कानून बनने से पहले उसकी वैधता पर विचार कर सकती है?

9. अनुच्छेद 142 का दायरा: क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश पारित कर सकता है जो मौजूदा संवैधानिक या विधायी प्रावधानों के विपरीत हो?

10. राज्यपाल की सहमति के बिना कानून: क्या विधानसभा द्वारा पारित कोई कानून राज्यपाल की सहमति के बिना लागू हो सकता है?

11. अनुच्छेद 131 और न्यायिक क्षेत्राधिकार: क्या अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र और राज्य सरकार के बीच विवादों को सुलझाने के अलावा अदालत के पास और कोई अधिकार क्षेत्र है?

12. अनुच्छेद 145(3) के तहत पीठ का गठन: क्या इस तरह के संवैधानिक सवालों के लिए कम से कम पांच जजों की पीठ जरूरी है?

13. प्रक्रियात्मक बनाम नीतिगत शक्तियां: क्या अनुच्छेद 142 की शक्तियां सिर्फ प्रक्रियात्मक कानूनों तक सीमित हैं या वे मौलिक प्रावधानों को भी प्रभावित कर सकती हैं?

14. संवैधानिक शक्तियों में बदलाव की सीमा: क्या सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति/राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों में कोई बदलाव कर सकता है?

बहस का भविष्य और संवैधानिक महत्व
राष्ट्रपति द्वारा उठाए गए ये सवाल न केवल विधायी प्रक्रिया की स्पष्टता के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह भी तय करेंगे कि भारत के संघीय ढांचे में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट को अब यह तय करना होगा कि क्या वह विधायी निर्णय प्रक्रिया में समयसीमा निर्धारित करने का अधिकार रखता है या नहीं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा सुप्रीम कोर्ट से पूछे गए ये सवाल देश की संवैधानिक संरचना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों को स्पष्ट करने का अवसर प्रदान करते हैं। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का जवाब आने वाले वर्षों के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है।

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