April 30, 2026

तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल: कलैगनार यूनिवर्सिटी बिल पर फिर पहुंचा विवाद सुप्रीम कोर्ट

राज्यपाल आर. एन. रवि के फैसले को सरकार ने बताया संवैधानिक मर्यादा से परे, SC में दी चुनौती

तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर राज्य सरकार और राज्यपाल के टकराव के केंद्र में आ गई है। मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन की सरकार ने अब राज्यपाल आर. एन. रवि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। विवाद की जड़ है कलैगनार विश्वविद्यालय विधेयक, जिसे राज्यपाल ने राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए आरक्षित कर दिया था। राज्य सरकार का कहना है कि यह कदम राज्यपाल की संवैधानिक सीमाओं से परे है और राज्य के अधिकारों में हस्तक्षेप के समान है।

तमिलनाडु सरकार की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि राज्यपाल का यह फैसला शिक्षा और विश्वविद्यालय प्रशासन जैसे विषयों पर राज्य के अधिकारों को कमजोर करता है। सरकार का तर्क है कि राज्यपाल को ऐसे मामलों में विधेयक को रोकने या अनिश्चितकाल तक लंबित रखने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि यह राज्य सरकार के विधायी अधिकार क्षेत्र में आता है। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्यपालों को लंबित विधेयकों पर जल्द फैसला लेने की सख्त हिदायत दी थी।

दरअसल, विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब तमिलनाडु सरकार ने विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव का प्रस्ताव पेश किया था। राज्य सरकार चाहती थी कि कुलपति की नियुक्ति राज्यपाल नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री और सरकार द्वारा की जाए। विधानसभा से यह विधेयक पारित भी हो गया, लेकिन राज्यपाल ने इसे मंजूरी देने से इंकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने एक नई समिति गठित कर दी, जो कुलपतियों की नियुक्ति की सिफारिश करती। इस कदम को सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 163 और 200 का उल्लंघन बताया।

पहले भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां अदालत ने तमिलनाडु सरकार के पक्ष में टिप्पणी करते हुए कहा था कि राज्यपाल विधायी प्रक्रिया में बाधा नहीं बन सकते। अदालत ने राज्यपालों को निर्देश दिया था कि वे तीन महीने के भीतर किसी भी लंबित विधेयक पर निर्णय लें। लेकिन तमिलनाडु सरकार का कहना है कि राज्यपाल इस आदेश की भी अनदेखी कर रहे हैं।

राज्यपाल और सरकार के बीच जारी यह टकराव कोई नया नहीं है। इससे पहले भी पाठ्यक्रम, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर कई बार दोनों के बीच तनातनी देखने को मिली है। मुख्यमंत्री स्टालिन ने कई बार आरोप लगाया है कि राज्यपाल शिक्षा और शासन से जुड़ी महत्वपूर्ण फाइलों को जानबूझकर रोके रखते हैं, जिससे नीतिगत कामकाज में देरी होती है।

अब एक बार फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने के बाद इस विवाद ने संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 की सीमाओं पर नई बहस छेड़ दी है — कि आखिर राज्यपाल की भूमिका कितनी सलाहकारी है और क्या वे निर्वाचित सरकार के फैसलों को अनिश्चितकाल तक रोक सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट में अब होने वाली सुनवाई तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि देश के कई अन्य राज्यों के लिए भी नज़ीर साबित हो सकती है, जहां राज्यपाल और सरकार के बीच इसी तरह के टकराव बार-बार सामने आते रहते हैं।

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