जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में उठाया बड़ा मुद्दा, मुग़ल काल के नाम बदलने की दी मांग
उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत व्याकरण पर व्याख्यान देने पहुंचे जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने वहां एक और बड़ा बयान दिया, जिससे राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है। उन्होंने मांग की कि काशी के औरंगाबाद का नाम बदला जाए और साथ ही उन सभी मोहल्लों के नाम बदले जाएं, जो मुग़ल काल के दौरान रखे गए थे। उनके इस बयान ने एक बार फिर से सनातन धर्म और भारत के इतिहास पर बहस को तेज़ कर दिया है।
पीएम मोदी से दोस्ती का दावा, अतीत की गलतियों को सुधारने का वक्त
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना मित्र बताते हुए कहा कि मोदी जी मेरी बात नहीं टालेंगे और मुझे पूरा विश्वास है कि वे मेरी मांगों पर गंभीरता से विचार करेंगे। उन्होंने कहा, “आज वो वक्त है जब हमें अतीत में हुई गलतियों को सुधारने की दिशा में कदम उठाने चाहिए।” रामभद्राचार्य का यह बयान खासकर काशी, औरंगाबाद और अन्य स्थानों के नामों पर हुए विवाद के बीच आया है, जो अब तक एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।
ज्ञानवापी मुद्दा और संघर्ष की निरंतरता
जगद्गुरु ने ज्ञानवापी मस्जिद के विवादित मुद्दे पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा, “ज्ञानवापी की मुक्ति तक हमारा संघर्ष चलता रहेगा। यह स्थान सनातन धर्म का शिखर है, और हम इसे मुक्त करवा कर रहेंगे।” यह बयान इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज्ञानवापी मस्जिद और उसके आसपास के विवाद ने पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक और राजनीतिक बहसों का कारण बना है।
काशी और अपनी शिक्षा की यादें
रामभद्राचार्य ने काशी के साथ अपने गहरे संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “काशी मेरी विद्याध्ययन की मातृभूमि है, जहां मैंने 11 साल तक वेदांत और संस्कृत व्याकरण का अध्ययन किया है। यहां आकर मुझे हमेशा खुशी होती है।” काशी, जिसे भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के केंद्र के रूप में माना जाता है, उनके लिए हमेशा एक विशेष स्थान रखता है।
मनुस्मृति पर फिर से बयान
रामभद्राचार्य ने मनुस्मृति को लेकर अपना बयान दोहराया और कहा कि “मनुस्मृति का एक भी शब्द राष्ट्र विरोधी नहीं है।” उन्होंने इस पर और विचार करते हुए कहा, “मैंने महाकुंभ में भी यही कहा था, और आज फिर से कह रहा हूं कि अगर आप मनुस्मृति का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि इसमें कहीं भी राष्ट्र के खिलाफ कुछ भी नहीं है।” उनके इस बयान को एक बार फिर से सनातन धर्म के समर्थन में एक मजबूत बयान माना जा रहा है, जो कई मौकों पर विवाद का कारण भी बन चुका है।
मुगल काल के नामों पर उठी बहस
रामभद्राचार्य ने इस मौके पर औरंगाबाद जैसे शहरों के नाम बदलने की मांग की। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि जिन जगहों के नाम मुग़ल काल में रखे गए हैं, उन्हें बदलने का समय आ चुका है। इस मांग ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। हालांकि, इस बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, कुछ लोग इसे ऐतिहासिक सुधार मानते हैं, जबकि कुछ इसे सांप्रदायिक रूप से विवादास्पद मानते हैं।
महाकुंभ में 66 करोड़ सनातनियों की भागीदारी
रामभद्राचार्य ने महाकुंभ में 66 करोड़ से ज़्यादा सनातनियों की भागीदारी का जिक्र करते हुए कहा कि विपक्ष चाहे जितना भी दुष्प्रचार करे, सनातन धर्म के अनुयायी कभी कमजोर नहीं होंगे। उन्होंने महाकुंभ के दौरान बड़े पैमाने पर हुई धार्मिक क्रियाओं का हवाला दिया और इसे सनातन धर्म के स्वर्णिम काल के रूप में प्रस्तुत किया।
नए भारत के निर्माण की ओर एक कदम और
रामभद्राचार्य का यह बयान कई मायनों में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न सिर्फ भारत की धार्मिक धारा को लेकर चर्चा को फिर से जीवित करता है, बल्कि देश के इतिहास और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी समस्याओं को भी उजागर करता है। इसके साथ ही, यह संकेत भी देता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत नए भारत के निर्माण की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है, जहां राष्ट्र की पहचान और संस्कृति को महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है।
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