पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा—राज्यपाल अनिश्चितकाल तक विधेयक रोक नहीं सकते, लेकिन उन पर बाध्यकारी समयसीमा लगाना शक्तियों के पृथक्करण के खिलाफ
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयकों पर मंजूरी की समयसीमा तय करने के मुद्दे पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट कहा कि अदालत राष्ट्रपति या राज्यपाल पर विधेयक पारित करने के लिए कोई टाइमलाइन नहीं थोप सकती। कोर्ट ने माना कि समयसीमा लागू करना संविधान की मूल भावना और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत होगा। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते, और उन्हें ‘उचित समय’ में कार्यवाही करनी होगी।
पीठ ने फैसला देते हुए कहा कि राज्यपाल को उनके निर्णयों के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन संवैधानिक अदालतें उनके फैसलों की समीक्षा जरूर कर सकती हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बताया कि अनुच्छेद 200 और 201 राज्यपाल एवं राष्ट्रपति के अधिकारों को बेहद सावधानी से परिभाषित करते हैं, और न्यायालय इन अधिकारों का हरण नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी कहा कि यदि राज्यपाल किसी विधेयक पर स्वीकृति नहीं देते हैं तो उन्हें उसे वापस विधानसभा भेजना चाहिए ताकि सदन पुनर्विचार कर सके।
फैसले में यह भी स्पष्ट हुआ कि राज्यपाल के पास विधेयक पर तीन ही विकल्प हैं—स्वीकृति देना, रोकना या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना। कुछ पक्षों ने तर्क दिया कि राज्यपाल के पास चौथा विकल्प भी होना चाहिए, लेकिन अदालत ने उस व्याख्या को अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि राज्यपाल ‘रोकने’ की कार्रवाई करते हैं, तो उन्हें विधेयक विधानसभा को वापस भेजना ही होगा, जब तक कि वह धन विधेयक न हो।
तमिलनाडु मामले पर टिप्पणी करते हुए संविधान पीठ ने दो जजों की उस पूर्व पीठ को गलत बताया, जिसने लंबित विधेयकों को अनुच्छेद 142 का प्रयोग करके ‘मान्य स्वीकृति’ दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि न्यायालय किसी भी परिस्थिति में राज्यपाल या राष्ट्रपति की शक्तियों का अधिग्रहण नहीं कर सकता। अदालत ने दो टूक कहा कि ‘मान्य स्वीकृति’ जैसी अवधारणा असंवैधानिक है क्योंकि इससे न्यायपालिका किसी दूसरे संवैधानिक पद की भूमिका संभालने लगती है, जो संविधान के ढांचे में स्वीकार्य नहीं है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा अनुच्छेद 143(1) के तहत भेजे गए संदर्भ पर यह फैसला आया है। राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या विधेयकों पर निर्णय के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल के लिए न्यायालय समयसीमा निर्धारित कर सकता है। यह मामला तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु सरकार ने शिकायत की थी कि राज्यपाल आर.एन. रवि ने कई विधेयकों को महीनों तक बिना निर्णय लंबित रखा। सुप्रीम कोर्ट ने अब साफ कर दिया है कि कानून यह अनुमति नहीं देता कि अदालत इन संवैधानिक पदों पर कोई बाध्यकारी सीमा लगाए।
पीठ ने अंत में कहा कि न्यायालय केवल इतना कर सकता है कि वह राष्ट्रपति या राज्यपाल को ‘उचित समय’ में निर्णय लेने की सलाह दे, लेकिन बाध्यकारी आदेश नहीं दे सकता। अदालत ने यह भी बताया कि यदि कोई विधेयक कानून बन जाए, तभी उसके कार्यान्वयन की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। यह फैसला संघीय संरचना, शक्तियों के पृथक्करण और संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
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