April 21, 2026

प्रधानमंत्री मोदी ने जहान-ए-खुसरो समारोह में सूफी परंपरा की महिमा पर दिया वक्तव्य, क्या इस आयोजन से संस्कृति में नए आयाम जुड़ेंगे?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 फरवरी को नई दिल्ली के सुंदर नर्सरी में आयोजित ‘जहान-ए-खुसरो’ सूफी संगीत समारोह में हिस्सा लिया, जहां उन्होंने भारतीय सूफी संत परंपरा की गहरी महिमा और सुंदरता पर अपने शब्दों से चार चांद लगा दिए। इस अवसर पर पीएम मोदी ने सूफी संगीत की शक्ति को सलाम करते हुए कहा कि किसी भी देश की संस्कृति और सभ्यता का असली प्रतिबिंब उसके गीतों और संगीत में मिलता है, और भारतीय सूफी परंपरा ने इस दृष्टिकोण से एक अमूल्य योगदान दिया है।

सूफी संगीत की ख्वाब जैसी दुनिया में खो गए पीएम मोदी

पीएम मोदी ने जहान-ए-खुसरो के इस अद्भुत आयोजन को एक अत्यधिक संवेदनशील और प्रेरणादायक कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम ने प्रेम और भक्ति के रस से एक नई दुनिया में कदम रखा है। सूफी संतों ने अपनी शिक्षाओं और संगीत के माध्यम से न केवल इस्लाम की पारंपरिक सीमाओं को पार किया, बल्कि वेदों और अज़ान के गीतों को भी अपनाया। पीएम मोदी ने जहान-ए-खुसरो के इस आयोजन को 25 वर्षों से चल रहे सिलसिले के रूप में देखा, जो आज भारतीय संगीत और संस्कृति के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में स्थापित हो चुका है।

“जहान-ए-खुसरो की खुशबू हिंदुस्तान की मिट्टी की है”

पीएम मोदी ने जहान-ए-खुसरो समारोह के संदर्भ में कहा, “इस आयोजन की खुशबू एकदम विशेष है, और यह खुशबू हमारे हिंदुस्तान की मिट्टी से आती है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह वही हिंदुस्तान है जिसकी तुलना हजरत अमीर खुसरो ने जन्नत से की थी। उनका यह बयान भारतीय संस्कृति की विविधता और सूफी परंपरा की अनूठी सुंदरता को दिखाता है। पीएम मोदी ने यह भी कहा कि हमारा देश जन्नत का बगीचा है, जहां तहजीब और सभ्यता के हर रंग ने अपनी अपनी जगह बनाई है।

सूफी परंपरा: इंसानियत और दुनिया को जोड़ने वाली कड़ी

प्रधानमंत्री मोदी ने सूफी परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस परंपरा ने न केवल इंसान की रुहानी दूरी को समाप्त किया, बल्कि यह दुनियाभर के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने का काम भी करती है। उन्होंने मशहूर सूफी संत रूमी के एक उद्धरण का उल्लेख करते हुए कहा, “रूमी ने कहा था कि ‘शब्दों को ऊंचाई दें, आवाजों को नहीं, क्योंकि फूल बारिश में पैदा होते हैं, तूफान में नहीं।’ यह संदेश सूफी परंपरा का सार है, जो हमें शांति, प्रेम और आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करता है।”

क्या जहान-ए-खुसरो सूफी परंपरा की आधुनिक पहचान बन जाएगा?

पीएम मोदी ने अपनी बातों का समापन करते हुए कहा कि आज जहान-ए-खुसरो सिर्फ एक संगीत समारोह नहीं, बल्कि सूफी परंपरा की आधुनिक पहचान बन चुका है। यह आयोजन भारतीय संस्कृति की शक्ति और इसकी विविधता को दुनिया भर में फैलाने का एक महत्वपूर्ण मंच बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने जहान-ए-खुसरो के आयोजन को भारतीय संस्कृति के महत्व को पुनः स्थापित करने वाला बताया, जो आने वाली पीढ़ियों को सूफी संतों की धरोहर से जोड़ने का कार्य करेगा।

संस्कृति का एक अद्भुत संगम

जहान-ए-खुसरो समारोह ने न केवल सूफी संगीत के प्रेमियों को आकर्षित किया, बल्कि यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रति लोगों की जागरूकता को भी बढ़ाया। इस कार्यक्रम ने सूफी संगीत और भारतीय संगीत परंपरा के बीच के रिश्ते को मजबूत किया है और साथ ही भारतीय समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता की सुंदरता को उजागर किया है।

अब यह सवाल उठता है कि क्या इस आयोजन के जरिए सूफी परंपरा को और भी गहराई से समझा जाएगा और क्या जहान-ए-खुसरो इस सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर लोगों की सोच को बदलने में सफल होगा? आने वाले समय में इसके नतीजे और प्रभाव पर नजर रखना दिलचस्प होगा।

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