190 देशों की बैठक में प्लास्टिक उत्पादन घटाने पर सहमति नहीं, ड्राफ्ट पर उठे सवाल
दुनियाभर में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए 190 देशों के प्रतिनिधि जेनेवा में 5 से 14 अगस्त 2025 के बीच एकत्र हुए। बैठक का उद्देश्य समुद्री और पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने के लिए एक कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक संधि तैयार करना था। हालांकि, प्लास्टिक उत्पादन पर सीमा लगाने के मुद्दे पर कोई सहमति नहीं बन सकी और तैयार किए गए ड्राफ्ट में इस विषय का केवल एक बार ज़िक्र किया गया, जिससे कई देशों ने कड़ी आलोचना की।
प्लास्टिक उत्पादन का स्तर पिछले कुछ दशकों में तेज़ी से बढ़ा है—1950 में जहां यह दो मिलियन टन था, वहीं 2022 तक यह बढ़कर 475 मिलियन टन पहुंच गया। इस वजह से कई देश उत्पादन सीमा (cap) लगाने के पक्ष में हैं, जबकि तेल और प्लास्टिक उत्पादक देश जैसे सऊदी अरब, रूस और ईरान इसका विरोध कर रहे हैं। नए ड्राफ्ट में कहा गया है कि प्लास्टिक का उत्पादन और इस्तेमाल टिकाऊ तरीके से होना चाहिए, लेकिन इसे सीमित करने के लिए ठोस प्रावधान नहीं हैं। पिछले ड्राफ्ट में मौजूद उत्पादन पर अलग अध्याय को भी इसमें हटा दिया गया है।
कई देशों ने ड्राफ्ट को “कमज़ोर” और “अधूरा” बताया। कोलंबिया ने इसे पूरी तरह अस्वीकार्य करार दिया, जबकि चिली ने इसमें कई खामियां गिनाईं। केन्या ने इसे केवल “वेस्ट मैनेजमेंट” पर केंद्रित दस्तावेज बताया, जिसमें प्लास्टिक को सीमित करने की दिशा में कोई लोकतांत्रिक मूल्य नहीं है। वहीं भारत ने इसे एक अच्छी शुरुआत माना, हालांकि कई देशों का मानना है कि यह समस्या की जड़ पर वार करने में नाकाम है।
वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, प्लास्टिक प्रदूषण से होने वाली बीमारियों और मौतों की आर्थिक कीमत प्रति वर्ष कम से कम 1.5 ट्रिलियन डॉलर है। अनुमान है कि दुनिया के महासागरों में इस समय लगभग 200 ट्रिलियन प्लास्टिक के टुकड़े तैर रहे हैं, जो समुद्री जीवन और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा हैं।
बैठक के बाद यह स्पष्ट है कि वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण की चुनौती से निपटने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। अगली बैठक में उत्पादन पर स्पष्ट नीति बनाने की उम्मीद जताई जा रही है, लेकिन फिलहाल पर्यावरणविद इस नतीजे से निराश हैं।
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