May 1, 2026

पटना: लालू परिवार में बढ़ती कलह, ‘शकुनी’ विवाद ने खोली राजनीतिक वंशवाद की परतें

तेजस्वी बनाम तेज प्रताप-रोहिणी टकराव से घर की लड़ाई सड़क तक, राजनीतिक भविष्य पर गहराया संकट

बिहार की राजनीति जिस परिवारवाद के सहारे दशकों तक चलती रही, आज उसी परिवारवाद की आग में झुलसती दिखाई दे रही है। लालू प्रसाद यादव के परिवार में बढ़ती कलह अब भीतर तक जड़ें जमा चुकी है। बड़े बेटे तेज प्रताप और बेटी रोहिणी आचार्य का तेजस्वी यादव पर खुला हमला इस बात का संकेत है कि ‘समाजवाद’ का झंडा उठाने वाला यह राजनीतिक घराना अब खुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। तेज प्रताप और रोहिणी का आरोप है कि तेजस्वी ने अपने करीबी सलाहकारों—संजय यादव और रमीज—को ‘शकुनी’ की तरह घर में स्थापित कर दिया है, जिससे परिवार के सदस्यों को ही लालू और राबड़ी से मिलने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है।

परिवारवाद और सत्ता संघर्ष भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक, सत्ता के केंद्र में परिवार रहे और कलह की वजह से ये परिवार बिखरते भी रहे। महाभारत से लेकर मुगल वंश तक की कहानियों में परिवार के भीतर पैदा हुए विवाद ही उनके विनाश का कारण बने। आधुनिक भारत में भी कई बड़े राजनीतिक घरानों ने यही किस्मत देखी—मुलायम परिवार में संघर्ष, बादल परिवार का पतन, ठाकरे परिवार का बिखराव और करुणानिधि परिवार के भीतर सत्ता की होड़ इसके उदाहरण हैं। अब यही आग लालू परिवार तक पहुंच चुकी है।

लालू यादव ने अपनी विरासत छोटे बेटे तेजस्वी के नाम की, लेकिन इससे बड़े बेटे तेज प्रताप का विरोध खुलकर सामने आ गया। अलग पार्टी बनाने से लेकर हालिया बयानबाजी तक, तेज प्रताप लगातार संकेत दे रहे हैं कि परिवार के भीतर का समीकरण अब सामान्य नहीं रहा। रोहिणी आचार्य भी इस मोर्चे पर भाई के साथ खड़ी दिख रही हैं। दोनों का दावा है कि तेजस्वी के सलाहकार परिवार को आपस में मिलने तक नहीं देते। बीमार लालू इस कलह को रोकने में असमर्थ दिखाई देते हैं और यही चिंता अब बिहार की राजनीति पर भी असर डाल रही है।

बड़े राजनीतिक परिवार जब सत्ता को अपना व्यक्तिगत अधिकार समझने लगते हैं, तब संघर्ष की शुरुआत वहीं से होती है। बिहार में 1990 के दशक में लालू और राबड़ी के शासनकाल ने सामाजिक न्याय की राजनीति को ऊंचाई दी, मगर परिवार की राजनीति ने ही बिहार की विकास यात्रा को धीमा किया। उद्योग ठप हुए, पढ़ा-लिखा मध्य वर्ग राज्य छोड़कर बाहर चला गया और आज भी उसका असर देखा जा सकता है। आज जब फिर वही परिवार राजनीतिक लड़ाई में उलझा है, तो यह सवाल मजबूत होता है कि क्या परिवारवाद किसी भी दल की दीर्घकालिक मजबूती के लिए घातक है?

उत्तर प्रदेश के यादव परिवार में भी कलह थी, लेकिन अखिलेश यादव ने किसी तरह नेतृत्व को बचाए रखा। तमिलनाडु के करुणानिधि परिवार में भी टकराव हुआ, महाराष्ट्र के ठाकरे परिवार में सत्ता टूटकर बिखरी और पंजाब में बादल परिवार अब लगभग हाशिये पर है। यही प्रवृत्ति बताती है कि राजनीतिक परिवारों की तीसरी-चौथी पीढ़ी अक्सर संघर्ष का सामना नहीं कर पाती। यदि उत्तराधिकारी सक्षम हों तो विरासत बच जाती है, वरना सत्ता और संगठन दोनों जर्जर होने लगते हैं।

आज लालू परिवार उसी कगार पर खड़ा है। तेजस्वी यादव का नेतृत्व जहां सवालों के घेरे में है, वहीं तेज प्रताप और रोहिणी का आक्रोश इस संकट को और गहरा कर रहा है। सवाल अब यह नहीं कि RJD में कौन सही है, बल्कि यह कि क्या लालू प्रसाद यादव अपने परिवार को बिखरने से बचा पाएंगे?

यह लड़ाई सिर्फ घर की नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति की अगली दिशा तय करने वाली है।

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