May 3, 2026

पटना: राहुल का अहंकार, तेजस्वी की हड़बड़ी और रणनीतिक चूक—बिहार में क्यों डूबा महागठबंधन

NDA की सुनामी के बीच RJD–कांग्रेस का इतिहासिक पतन, PK की जनसुराज भी बनी चुनावी ‘मजाक’; सवर्ण–दलित–मुस्लिम समीकरण टूटे तो उभरते मध्य वर्ग ने दिखाई नई दिशा

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया। जहां एक ओर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला NDA रिकॉर्ड बढ़त के साथ सत्ता में लौटा, वहीं महागठबंधन के लिए यह चुनाव किसी आपदा से कम नहीं रहा। RJD, कांग्रेस और वाम दलों की संयुक्त ताकत 35 सीटों पर सिमट गई। विश्लेषकों के मुताबिक, इस हार की सबसे बड़ी वजह नेतृत्व की ग़लत रणनीति, वोटरों की बदलती सोच, जातीय समीकरणों की कमजोरी और गठबंधन के भीतर समन्वय का पूरी तरह समाप्त होना रहा। साथ ही, प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी का एक भी सीट न जीतना और ज्यादातर उम्मीदवारों की जमानत जब्त होना चुनावी हास्य का विषय बन गया।

महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी नेतृत्व स्तर पर तालमेल का अभाव रहा। तेजस्वी यादव ने चुनाव प्रचार के दौरान जितनी तेजी दिखाई, उतनी ही जल्दबाजी उनकी रणनीति में भी दिखी। वे न गठबंधन के नेताओं से संवाद बना सके, न सीटों के बंटवारे में संतुलन दिखा सके। उसी तरह राहुल गांधी चुनावी भाषणों में बार-बार भावनात्मक और आक्रामक टिप्पणियों में उलझे रहे, जो बिहार के उभरते पढ़े-लिखे मध्य वर्ग को पसंद नहीं आया। आज का बिहार वह 1990 वाला राज्य नहीं रहा, जहां भावनात्मक भाषण और करिश्माई नेतृत्व चुनाव जिता देता था। पिछले तीन दशकों में परिवारों ने शिक्षा, रोज़गार और सुरक्षित समाज को प्राथमिकता देना शुरू किया है। इसी तबके ने इस बार NDA को निर्णायक समर्थन दिया।

चुनाव प्रचार के दौरान महागठबंधन ने निजी हमलों की राजनीति को अधिक महत्व दिया, जबकि नीतीश–मोदी की टीम शासन, विकास, महिलाओं की सुरक्षा और युवाओं से जुड़े ठोस मुद्दों पर केंद्रित रही। तेजस्वी यादव जहां हर सभा में नीतीश कुमार की उम्र और स्वास्थ्य पर टिप्पणी करते रहे, वहीं राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले करते रहे। इससे सकारात्मक एजेंडा पूरी तरह गौण हो गया। उधर, अल्पसंख्यक और सवर्ण वोट बैंक पर कांग्रेस का पारंपरिक पकड़ भी ढह गया। मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा AIMIM के खाते में चला गया, जबकि दलितों को चिराग पासवान ने मजबूती से अपने पाले में कर लिया।

प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी चुनाव में पूरी तरह फ्लॉप साबित हुई। बिहार भर में ‘नया विकल्प’ होने का दावा करने के बावजूद PK न तो ग्रामीण वोटरों को प्रभावित कर सके, न शहरों के पढ़े-लिखे वर्ग को। उनकी रणनीति को कई नेताओं ने अपरिपक्व बताया और अधिकांश क्षेत्रों में उनके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। परिणाम यह रहा कि जनसुराज पार्टी राजनीति के गंभीर खिलाड़ी के बजाय चुनावी मज़ाक की श्रेणी में दर्ज हो गई।

इस चुनाव ने बिहार में M–Y समीकरण को भी नया अर्थ दे दिया। अब M–Y का मतलब मुस्लिम–यादव नहीं, बल्कि ‘महिला–युवा’ हो गया है। महिलाओं ने NDA को इसलिए समर्थन दिया क्योंकि उन्हें नीतीश सरकार के फैसलों से घर–परिवार में सुरक्षा, आर्थिक सहायता, शराबबंदी और बेटियों की शिक्षा में सुधार महसूस हुआ। वहीं युवाओं ने BJP के रोजगार और स्किल मिशन के वादों पर भरोसा जताया। जातीय राजनीति के पुराने मॉडल की जगह विकास–सुरक्षा की नई राजनीति ने जगह ले ली और इसी कारण महागठबंधन का आधार खिसक गया।

कुल मिलाकर, बिहार चुनाव 2025 महागठबंधन के लिए राजनीतिक सबक बनकर सामने आया है। नेतृत्व का अहंकार, रणनीति की विफलता, सवर्ण–दलित–मुस्लिम समीकरणों का टूटना, मध्य वर्ग की सोच में बदलाव और NDA का मजबूत प्रचार नेटवर्क—इन सभी ने मिलकर RJD–कांग्रेस की नैया डुबो दी। दूसरी तरफ, नीतीश–मोदी गठजोड़ ने विकास, सुशासन और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चुनाव को मजबूती से साधा और निर्णायक जीत दर्ज की।

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