14 फरवरी को बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने दावा किया कि उसने पाकिस्तान सेना के सात जवानों को बंधक बना लिया है। संगठन की ओर से जारी वीडियो और तस्वीरों में इन सैनिकों को दिखाते हुए सात दिन की समय-सीमा दी गई और कहा गया कि यदि उसके गिरफ्तार लड़ाकों को रिहा नहीं किया गया तो 21 फरवरी के बाद इन जवानों को मार दिया जाएगा। हालांकि पाकिस्तान सेना के मीडिया विंग इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि वीडियो में दिख रहे लोग पाकिस्तानी सैनिक नहीं हैं तथा फुटेज से छेड़छाड़ की गई है।
इसके बाद BLA ने एक और वीडियो जारी किया, जिसमें कथित रूप से बंधक बनाए गए सैनिक अपने सैन्य पहचान पत्र और राष्ट्रीय पहचान पत्र दिखाते नजर आए। एक सैनिक ने सवाल उठाया कि यदि ये दस्तावेज असली नहीं हैं तो इन्हें जारी किसने किया। इस घटनाक्रम के बाद पाकिस्तान सरकार और सेना की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान सेना की कमान असीम मुनीर के हाथों में है और इसे केवल बंधक संकट नहीं बल्कि सैन्य पारदर्शिता की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
इस पूरे विवाद की तुलना 1999 के कारगिल युद्ध से भी की जा रही है। उस समय भी पाकिस्तान ने शुरुआत में यह स्वीकार नहीं किया था कि उसके नियमित सैनिक नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय क्षेत्र में दाखिल हुए थे। तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ के नेतृत्व में आधिकारिक बयान यही दिया गया था कि लड़ाई कश्मीरी लड़ाके लड़ रहे हैं। बाद में युद्ध के दौरान मिले सबूतों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद पाकिस्तान को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी थी। इस ऐतिहासिक संदर्भ के कारण मौजूदा घटनाक्रम पर भी संदेह और बहस तेज हो गई है।
दरअसल, बलूचिस्तान लंबे समय से विद्रोह और सैन्य अभियानों का केंद्र रहा है। यहां सुरक्षा बलों और बलूच संगठनों के बीच लगातार संघर्ष होता रहा है और कई बार दोनों पक्षों के दावों में अंतर भी देखने को मिला है। पाकिस्तान सेना इस पूरे मामले को “इन्फॉर्मेशन वॉर” यानी डिजिटल माध्यम से दबाव बनाने की रणनीति बता रही है, लेकिन यदि वीडियो में दिखाए गए पहचान पत्र वास्तविक हैं तो आधिकारिक इनकार पर सवाल उठना स्वाभाविक माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार पाकिस्तान के इनकार के पीछे कई संभावनाएं हो सकती हैं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचने की रणनीति, विरोधी पक्ष द्वारा भ्रम फैलाने की कोशिश या जमीनी हकीकत और आधिकारिक बयान के बीच अंतर शामिल है। हालांकि इस पूरे मामले का मानवीय पहलू भी अहम है। यदि वीडियो में दिख रहे लोग वास्तव में सैनिक हैं, तो उनकी सुरक्षा और भविष्य को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो गई है। यह विवाद केवल सात सैनिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि किसी भी देश की सैन्य व्यवस्था अपने जवानों की पहचान और जिम्मेदारी से किस हद तक पीछे हट सकती है।
अब 21 फरवरी की समय-सीमा के बाद स्थिति किस दिशा में जाएगी, इस पर सबकी नजर बनी हुई है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान बातचीत या आधिकारिक स्वीकारोक्ति का रास्ता अपनाता है या फिर इनकार की नीति जारी रखता है। फिलहाल यह घटनाक्रम पाकिस्तान की सैन्य रणनीति, विश्वसनीयता और नैतिक जिम्मेदारी को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस को जन्म दे रहा है।
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