आजादी से पहले ‘नेताजी’ के बैंक ने छापे थे नोट, महात्मा गांधी नहीं थी तस्वीर
भारतीय रिजर्व बैंक का गठन 1 अप्रैल 1935 को हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश सरकार के अधीन काम करता था और नोटों पर ब्रिटिश राजाओं की तस्वीर छापी जाती थी। भारतीय इन नोटों से लेन-देन तो करते थे, लेकिन उन्हें यह अपनी असली मुद्रा नहीं लगती थी। ऐसे समय में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्र भारत के लिए खुद का बैंक और खुद की करेंसी शुरू करने का साहसिक कदम उठाया। इस तरह आजादी से पहले पहली बार ऐसे नोट जारी हुए, जिन पर न ब्रिटिश राजा की तस्वीर थी और न ही महात्मा गांधी की।
साल 1944 में रंगून में नेताजी ने ‘आजाद हिंद बैंक’ की स्थापना की। इसका उद्देश्य आजादी की लड़ाई के लिए धन जुटाना और अस्थायी आजाद हिंद सरकार के खजाने का निर्माण करना था। बैंक एक खाली बंगले में शुरू हुआ और महज एक हफ्ते में 50 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी के साथ खड़ा हो गया। इस पहल से यह साबित हुआ कि भारत राजनीतिक स्वतंत्रता से पहले भी अपना वित्तीय संस्थान चला सकता है।
बैंक के लिए धन जुटाना बड़ी चुनौती थी, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे भारतीय प्रवासियों ने उदारता दिखाई। व्यापारी, दुकानदार और बागान मजदूरों ने नकद और वस्तुओं में दान देकर पूंजी को कुछ ही दिनों में 21.5 करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया। यह धन सैनिकों के वेतन, युद्ध सामग्री, प्रचार और राहत कार्यों में इस्तेमाल होता था, जिससे आजाद हिंद फौज को मजबूती मिली।
आजाद हिंद बैंक ने अपनी खुद की मुद्रा जारी की, जो आजाद हिंद फौज के कब्जे वाले क्षेत्रों में चलती थी। इन नोटों पर सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर होती थी, जो भारतीय मुद्रा पर भारतीय अधिकार का प्रतीक था। हालांकि ब्रिटिश भारत में इनकी वैल्यू नहीं थी, लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह गर्व और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना।
द्वितीय विश्व युद्ध के अंत और रंगून के पतन के साथ यह बैंक बंद हो गया। हालांकि, 2016 में नेताजी से जुड़ी फाइलों के सार्वजनिक होने के बाद यह फिर चर्चा में आया, जब कुछ लोगों ने आजाद हिंद बैंक के पुराने नोटों से कर्ज चुकाने का प्रयास किया। लेकिन वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि RBI के पास इस बैंक का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है और RBI एक्ट 1934 के तहत नोट जारी करने का अधिकार सिर्फ भारतीय रिजर्व बैंक को है।
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