बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए (NDA) ने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए सारण जिले की मरहौरा विधानसभा सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार अंकित कुमार को समर्थन देने की घोषणा की है। यह फैसला तब लिया गया जब लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) [LJP(RV)] की उम्मीदवार सीमा सिंह का नामांकन तकनीकी कारणों से रद्द कर दिया गया। एनडीए के इस कदम ने चुनावी समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है, क्योंकि अब यह सीट एक निर्दलीय प्रत्याशी के समर्थन से लड़ी जाएगी।
एलजेपी (आरवी) के प्रमुख व्हिप अरुण भारती ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पार्टी ने एक किसान के बेटे और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) से आने वाले अंकित कुमार को समर्थन देने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि “जब हमारे उम्मीदवार का नामांकन रद्द हुआ, तब हमने ऐसे व्यक्ति को चुना जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा है, मेहनतकश है और जनता की आवाज बन सकता है।” यह फैसला एनडीए के सामाजिक समीकरणों और अति पिछड़ा वर्ग पर फोकस की रणनीति को भी दर्शाता है।
वहीं, जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने इस फैसले को “राजनीतिक रूप से सार्थक” बताया और कहा कि एनडीए जननायक कर्पूरी ठाकुर के सिद्धांतों पर काम करता है। उन्होंने इंडिया गठबंधन (INDIA Bloc) पर निशाना साधते हुए कहा कि “इंडिया गठबंधन सिर्फ टाइटल चुराने में माहिर है, असल में जनता की सेवा करने में नहीं।” नीरज कुमार ने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही जननायक कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था, जो एनडीए के सामाजिक न्याय के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव रितुराज सिन्हा ने भी इस मौके पर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि एनडीए मरहौरा में वंशवाद की राजनीति को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है। रितुराज ने कहा, “इस सीट पर एक ही परिवार पांच बार से लगातार जीतता आ रहा है। अब जनता बदलाव चाहती है, और वह बदलाव अंकित कुमार के रूप में देखने को मिलेगा।” उन्होंने यह भी कहा कि मोदी-नीतीश के नेतृत्व में बिहार विकास और सामाजिक न्याय के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।
गौरतलब है कि मरहौरा विधानसभा सीट पर फिलहाल आरजेडी (RJD) के विधायक जीतेंद्र कुमार राय का कब्जा है, जो राय परिवार से आते हैं और लंबे समय से इस सीट पर राजनीतिक पकड़ बनाए हुए हैं। अब एनडीए का यह फैसला इस सीट पर मुकाबले को दिलचस्प बना रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अंकित कुमार के समर्थन से न केवल एनडीए की सामाजिक समीकरणों में मजबूती आएगी, बल्कि यह अति पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को भी सीधे तौर पर साधने की रणनीति का हिस्सा है। बिहार के चुनावी माहौल में यह फैसला एनडीए की “समावेशी राजनीति” का एक नया उदाहरण बनकर उभरा है।
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