फाल्गुन पूर्णिमा के दिन देशभर में होलिका दहन का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, लेकिन परंपरा के अनुसार सबसे पहले होलिका दहन उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में किया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसका विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव के रौद्र स्वरूप महाकाल को उज्जैन नगरी का राजा माना जाता है, इसलिए शहर में होने वाले हर बड़े धार्मिक उत्सव की शुरुआत सबसे पहले उनके दरबार से ही होती है।
होलिका दहन के अवसर पर मंदिर में विशेष तैयारियां की जाती हैं। संध्या आरती और विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद मंत्रोच्चार के बीच होलिका दहन किया जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में एकत्र होते हैं और इस पवित्र अनुष्ठान के साक्षी बनते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां विधिपूर्वक होलिका दहन करने से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और पूरे नगर में सुख, शांति और समृद्धि का संचार होता है।
महाकालेश्वर मंदिर में होने वाला यह आयोजन केवल एक धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है। दूर-दूर से श्रद्धालु इस विशेष अवसर पर उज्जैन पहुंचते हैं और होलिका की पवित्र अग्नि के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं। भक्तों का विश्वास है कि इस पावन अग्नि के दर्शन से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
होलिका दहन के बाद बची हुई पवित्र राख का भी विशेष महत्व होता है। इस राख का उपयोग अगले दिन होने वाली विशेष भस्म आरती में किया जाता है, जिसमें भगवान महाकाल का दिव्य श्रृंगार किया जाता है। यह परंपरा इस उत्सव को और भी विशिष्ट बनाती है और महाकाल की नगरी उज्जैन में होली के पर्व को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करती है।
इस तरह महाकालेश्वर मंदिर में सबसे पहले होने वाला होलिका दहन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान और प्राचीन परंपराओं का जीवंत उदाहरण भी है। यह आयोजन भक्तों के लिए श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक अनुभव का अद्वितीय संगम माना जाता है, जो हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
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