‘रोज 10 बीड़ी पीने से आया स्ट्रोक, सैन्य सेवा से नहीं’ — दिव्यांग पेंशन की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
दिव्यांग पेंशन की मांग को लेकर अदालत पहुंचे एक पूर्व सैनिक को बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने उनकी याचिका खारिज कर दी है। शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ता को ब्रेन स्ट्रोक सैन्य सेवा के कारण नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत आदतों के चलते आया था। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय के आधार पर यह स्पष्ट है कि रोजाना बड़ी मात्रा में बीड़ी पीने की वजह से उनकी स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ी, इसलिए इस मामले में दिव्यांगता पेंशन का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मामले की सुनवाई जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने की। दरअसल, याचिकाकर्ता ने पहले आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में दिव्यांग पेंशन की मांग को लेकर अपील दायर की थी, जिसे ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती दी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने ट्रिब्यूनल के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए उसकी वैधता को बरकरार रखा और अपील को निरस्त कर दिया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजा नहीं दिया जा सकता, जहां दिव्यांगता किसी व्यक्ति की स्वयं की आदतों या नियंत्रण में रहने वाले कारणों से उत्पन्न हुई हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को ब्रेन स्ट्रोक आने के पीछे उनकी धूम्रपान की आदत प्रमुख कारण थी और इसका सैन्य सेवा से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं पाया गया। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में भी यही कहा गया था कि याचिकाकर्ता प्रतिदिन लगभग 10 बीड़ी पीते थे, जिसके चलते उनकी स्वास्थ्य स्थिति गंभीर हुई।
जानकारी के अनुसार, पूर्व सैनिक सर्वेश कुमार को ब्रेन स्ट्रोक आने के बाद उन्होंने दावा किया था कि उनकी बीमारी सैन्य सेवा के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों का परिणाम है और इसी आधार पर उन्होंने दिव्यांग पेंशन की मांग की थी। लेकिन मेडिकल जांच और दस्तावेजों की समीक्षा के बाद अदालत ने पाया कि बीमारी और सैन्य सेवा के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं होता। अदालत ने कहा कि पेंशन संबंधी नियमों के अनुसार केवल वही दिव्यांगता सेवा से जुड़ी मानी जाती है, जिसका सीधा संबंध सैन्य ड्यूटी या उससे उत्पन्न परिस्थितियों से हो।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ‘पेंशन रेगुलेशन फॉर द आर्मी, 1961’ के नियम 173 और ‘गाइड टू मेडिकल ऑफिसर्स, 2002’ के प्रावधानों का भी उल्लेख किया। इन नियमों के तहत यदि किसी व्यक्ति की दिव्यांगता या मृत्यु शराब, तंबाकू, नशीले पदार्थों के अत्यधिक सेवन या अन्य व्यक्तिगत कारणों से होती है, तो उसे सेवा से संबंधित नहीं माना जाता और ऐसे मामलों में मुआवजा या पेंशन का प्रावधान लागू नहीं होता। अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने इन नियमों के अनुरूप निर्णय दिया था, इसलिए उसके आदेश में बदलाव का कोई आधार नहीं बनता।
इस फैसले को दिव्यांग पेंशन से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जिसमें अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत आदतों से उत्पन्न स्वास्थ्य समस्याओं को सैन्य सेवा से जोड़कर मुआवजे का दावा नहीं किया जा सकता। साथ ही, यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में कानूनी दिशा-निर्देश के रूप में भी देखा जा रहा है, जहां सेवा से संबंधित बीमारी और व्यक्तिगत कारणों के बीच अंतर को लेकर विवाद उत्पन्न होता है।
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