5 दिन से सोया नहीं था… सबको माफ कर दिया है…– जन्मदिन पर इंजीनियर ने मौत को क्यों चुना?
लखनऊ के इंदिरानगर में उस सुबह की खामोशी कुछ कह रही थी। सरकारी आवास के एक कमरे में, जल निगम में कार्यरत जूनियर इंजीनियर साकिब अहमद ने अपने जन्मदिन पर अपनी जिंदगी का अंत कर लिया। 34 वर्षीय साकिब की लाश कमरे के पंखे से लटकी मिली, पास ही एक सुसाइड नोट पड़ा था—जिसमें एक थके हुए इंसान की टूट चुकी आत्मा की पूरी कहानी दर्ज थी।
प्रयागराज जल निगम में तैनात साकिब अहमद सात महीने पहले ही मड़ियांव निवासी सुबुल से शादी कर चुके थे। वह इंदिरानगर सेक्टर-बी स्थित जल निगम कॉलोनी के सरकारी आवास में रह रहे थे। रविवार रात वह अपनी ससुराल गए थे और देर रात लौटे। अगली सुबह, जब उनकी बहन बुतुल उनसे मिलने पहुंची, तो दरवाजा अंदर से बंद था। बार-बार आवाज लगाने के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली, जिससे घबराकर उन्होंने पुलिस को सूचना दी।
पुलिस जब दरवाजा तोड़कर अंदर दाखिल हुई, तो वहां का दृश्य बेहद दर्दनाक था। साकिब ने फांसी लगाकर जान दे दी थी। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। मौके से मिला सुसाइड नोट बहुत कुछ कहता है—”मैं डिप्रेशन में हूं। पांच दिन से सोया नहीं हूं। घुट-घुट कर जीने से अच्छा है खुद को खत्म कर लूं। हालांकि यह गलत है। मेरे शव को मेरी बहन की कब्र के बगल में दफनाया जाए। सबको माफ कर दिया है।”
इस मार्मिक पत्र से यह साफ है कि साकिब लंबे समय से मानसिक अवसाद से जूझ रहे थे। उनके इस कदम ने न सिर्फ परिवार को बल्कि पूरे इलाके को सदमे में डाल दिया है। गाजीपुर थाने के इंस्पेक्टर विकास राय ने बताया कि अभी तक किसी भी परिजन की तरफ से तहरीर नहीं मिली है और मामले की जांच जारी है।
यह घटना न सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हमारे समाज की चुप्पी कब टूटेगी। एक पढ़ा-लिखा, नौकरीशुदा युवा अपनी पीड़ा को आखिरकार सुसाइड नोट में क्यों दर्ज करता है—क्यों नहीं उसके आसपास कोई ऐसा होता जो उसकी चुप्पी पढ़ सके? साकिब की कहानी एक चेतावनी है—हम सबके लिए।
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