कोल्हापुरी चप्पल से प्रेरित डिजाइन पर बवाल: प्राडा और कडुना केली के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचा मामला
इटालियन लग्जरी ब्रांड प्राडा के स्प्रिंग/समर 2026 मेन्सवेयर कलेक्शन में दिखाई गई एक खास सैंडल अब कानूनी विवादों में घिर गई है। बॉम्बे हाईकोर्ट में इस मामले पर एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि प्राडा ने पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पल की हूबहू नकल की है और भारतीय शिल्पियों को कोई श्रेय नहीं दिया। अधिवक्ता गणेश हिंगमिरे द्वारा दायर इस याचिका में फैशन ब्रांड प्राडा और डिजाइनर कडुना केली से मुआवजे की मांग की गई है।
जनहित याचिका में कोर्ट से मांग की गई है कि भारतीय पारंपरिक डिजाइनों की रक्षा की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय कंपनी जीआई (भौगोलिक संकेत) से चिह्नित उत्पादों की नकल न कर सके। याचिका में यह भी कहा गया है कि प्राडा द्वारा हाल ही में मिलान फैशन वीक में पेश किया गया “टो रिंग सैंडल” कलेक्शन दरअसल कोल्हापुरी चप्पलों से प्रेरित है।
प्राडा की ओर से शुरू में इस मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी, लेकिन आलोचनाओं के बढ़ते दबाव के बाद कंपनी ने 27 जून 2025 को महाराष्ट्र चैंबर ऑफ कॉमर्स को पत्र लिखकर यह स्वीकार किया कि उनके डिजाइन कोल्हापुरी चप्पल से प्रेरित हैं। कंपनी के कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी प्रमुख लोरेंजो बर्टेली ने कहा कि वे भारतीय शिल्पकारों के साथ सहयोग करने को तैयार हैं और वर्तमान डिज़ाइन अभी अपने प्रारंभिक चरण में है।
प्राडा की इन सैंडलों की कीमत 1 से 1.2 लाख रुपये तक बताई गई, जबकि भारत में कोल्हापुरी चप्पलें आमतौर पर 300 से 1500 रुपये में उपलब्ध होती हैं। याचिका में मांग की गई है कि कोर्ट की निगरानी में प्राडा और भारतीय शिल्पकार संगठनों के बीच सह-ब्रांडिंग और सहयोग सुनिश्चित किया जाए ताकि स्थानीय कारीगरों को उनका हक मिल सके और राजस्व साझा किया जा सके।
हिंगमिरे ने याचिका में यह भी उजागर किया कि वैश्विक फैशन ब्रांड अकसर भारतीय पारंपरिक शैलियों जैसे बंधनी, ब्लॉक प्रिंटिंग, साड़ी और शरारा की नकल करते हैं, जिससे भारतीय सांस्कृतिक धरोहर को नुकसान पहुंचता है। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि ऐसे मामलों में स्पष्ट और कड़े कानूनी आदेश जारी किए जाएं, जिससे GI टैग वाले उत्पादों की चोरी पर अंकुश लगाया जा सके।
कोल्हापुरी चप्पल का इतिहास भी बेहद समृद्ध और गौरवशाली है। इनका निर्माण 12वीं सदी से होता आया है। इतिहासकारों के अनुसार, राजा बिज्जल और समाज सुधारक बसवन्ना ने इसकी शुरुआत की थी, जबकि छत्रपति शाहू महाराज ने इसके व्यवसायीकरण को बढ़ावा दिया। ये चप्पलें पूरी तरह हस्तनिर्मित होती हैं और इनमें वनस्पति-टैन्ड चमड़े व प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता है। सिंथेटिक सामग्री या कीलें नहीं लगाई जातीं।
कोल्हापुरी चप्पलें महाराष्ट्र के कोल्हापुर, सांगली, सतारा, सोलापुर और कर्नाटक के बेलगावी, धारवाड़, बागलकोट जैसे जिलों में बनाई जाती हैं। इन्हें GI टैग भी प्राप्त है, जो इनकी मौलिकता और परंपरागत पहचान को कानूनी संरक्षण देता है। अब यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में है और इसके फैसले से यह तय होगा कि अंतरराष्ट्रीय ब्रांड भारतीय परंपरा और बौद्धिक संपदा का कितना सम्मान करते हैं।
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