लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने देश के पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की किताब को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। पिछले कई हफ्तों से संसद में चीन के साथ सीमा विवाद और उससे जुड़ी घटनाओं पर चर्चा करते समय राहुल गांधी को बोलने नहीं दिया गया था। इस बार उन्होंने संसद परिसर में सीधे किताब को अपने हाथ में उठाया और कहा कि यह किताब विदेश में उपलब्ध है, लेकिन भारत में इसे प्रकाशित नहीं होने दिया गया। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में आएंगे, तो उन्हें यह किताब भेंट करेंगे।
कांग्रेस नेता ने किताब को लेकर स्पष्ट किया कि यह किसी विपक्षी नेता की नहीं है और न ही किसी विदेशी लेखक की। यह किताब पूरी तरह से भारत के पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे द्वारा लिखी गई है। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भी लंबा पोस्ट साझा करते हुए बताया कि आज अगर प्रधानमंत्री संसद में आते हैं, तो वह उन्हें इस किताब को भेंट करेंगे। उन्होंने किताब की उपलब्धता पर सवाल उठाते हुए कहा कि कैबिनेट मंत्रियों के पास भी इस किताब की जानकारी नहीं है।
राहुल गांधी ने किताब के स्रोत पर सवालों का भी जवाब देते हुए कहा, “आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह किताब कहां से आई होगी। आप सोचिए कि यह कहां से आई होगी।” उन्होंने संसद में यह भी जोर देकर कहा कि किताब में चीन के साथ सीमा पर हुई घटनाओं का विस्तृत विवरण है और यह बताती है कि सेना प्रमुख को किस तरह निर्णय लेने के लिए इंतजार कराया गया।
किताब में उल्लेख किया गया है कि जब चीनी सेना भारत की सीमा में घुसी थी, तब महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए सेना प्रमुख को प्रतीक्षा करनी पड़ी। उस नाजुक स्थिति में प्रधानमंत्री ने केवल इतना कहा कि “जो आपको उचित लगे, वही करें।” राहुल गांधी ने इसे प्रधानमंत्री के उस व्यवहार का उदाहरण बताते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि सेना की भूमिका और निर्णय लेने की स्वतंत्रता कितनी महत्वपूर्ण है।
इस मौके पर राहुल गांधी का संदेश साफ था कि किताब केवल सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों पर केंद्रित है और इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किताब को पढ़कर देश के नागरिकों को समझना चाहिए कि सेना प्रमुख को किस तरह की परिस्थितियों में निर्णय लेने का सामना करना पड़ा और इसके बावजूद सरकार की नीति ने क्या भूमिका निभाई। राहुल गांधी की यह पहल संसद और मीडिया में चर्चा का विषय बनी हुई है, और किताब को लेकर भविष्य में राजनीतिक और रणनीतिक बहसें तेज होने की संभावना है।
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