‘केसरी वीर’ रिव्यू: जोश में दम था, लेकिन जुड़ाव में कमी रह गई
क्या थी उम्मीद?
इतिहास के वीर नायकों को सिल्वर स्क्रीन पर देखना हमेशा से उत्साहित करता है। ‘हमीरजी गोहिल’ जैसे वीर पर बनी फिल्म से उम्मीद थी कि ये मन और गर्व दोनों छू जाएगी, लेकिन ‘केसरी वीर’ उम्मीदों पर आधा-अधूरा ही खरा उतरती है।
क्या है फिल्म की कहानी?
यह कहानी है गुजरात के राजा हमीरजी गोहिल की, जिन्होंने 16 वर्ष की उम्र में तुगलक साम्राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ा। तुगलक सूबेदार जफर खान द्वारा मंदिरों को तोड़े जाने और धर्मांतरण के दमन के विरोध में हमीरजी ने 200 सैनिकों के साथ विद्रोह किया। इस संघर्ष में उनके साथी हैं वेगड़ा भिल (सुनील शेट्टी) और बाकी गुजरात के राजा।
फिल्म में सोमनाथ मंदिर की रक्षा, हिंदू अस्मिता और मातृभूमि के लिए बलिदान की भावनात्मक गहराई दिखाई जाती है।
क्या है फिल्म की ताकत?
कहानी मजबूत है: हमीरजी गोहिल की वीरगाथा अपने आप में शक्तिशाली है।
संदेश दमदार है: धर्म, संस्कृति और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए युवाओं के योगदान को दिखाया गया है।
बैकग्राउंड स्कोर और कॉस्ट्यूम: कुछ युद्ध सीन और संगीत भावनाओं को जगाते हैं, लेकिन यह ज्यादा देर टिकता नहीं।
कमज़ोर कड़ियाँ?
निर्देशन बेहद ढीला है: निर्देशक प्रिंस धीमान फिल्म को न तो इतिहास की गरिमा दे पाए और न ही सिनेमाई लय।
सूरज पंचोली की एक्टिंग बेहद सपाट: हमीरजी जैसे किरदार को निभाने के लिए जिस आत्मबल और चेहरे के भावों की ज़रूरत थी, वो सूरज में नहीं झलकते।
आकांक्षा शर्मा का किरदार खोखला है: न संवाद में गहराई, न अभिनय में पकड़।
सुनील शेट्टी और विवेक ओबेरॉय की प्रतिभा बर्बाद हुई: दोनों अनुभवी कलाकार हैं, लेकिन उन्हें कुछ खास करने का मौका नहीं मिला।
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