May 1, 2026

केरल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: जज को खुद देखना होगा अश्लील वीडियो, तभी होगी सुनवाई

केरल हाई कोर्ट ने एक अहम निर्णय सुनाते हुए साफ कहा है कि अगर किसी व्यक्ति पर अश्लील वीडियो वितरित करने का आरोप है तो ट्रायल कोर्ट के जज को खुद उस वीडियो को देखकर तय करना होगा कि वास्तव में उसमें अश्लीलता है या नहीं। अदालत ने यह निर्देश हरिकुमार नामक एक आरोपी के मामले में दिया, जिसे निचली अदालत ने वीडियो कैसेट की जांच किए बिना ही दोषी ठहरा दिया था। हाई कोर्ट ने कहा कि यह फैसला भारतीय साक्ष्य अधिनियम के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए और बिना प्रत्यक्ष जांच के किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

 

मामला कोट्टायम जिले के हरिकुमार से जुड़ा था, जो एक वीडियो शॉप चलाते थे। उन पर आरोप था कि उनकी दुकान से दस अश्लील वीडियो कैसेट बरामद किए गए। ट्रायल कोर्ट ने बिना वीडियो देखे ही केवल पुलिस रिपोर्ट और गवाहों के बयानों के आधार पर हरिकुमार को आईपीसी की धारा 292(2)(a), (c) और (d) के तहत दोषी ठहराते हुए दो साल की सजा और 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। बाद में इस सजा को घटाकर एक साल कर दिया गया, लेकिन जुर्माना बरकरार रखा गया।

 

हरिकुमार ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी और दलील दी कि मजिस्ट्रेट ने उन वीडियो कैसेट की असली सामग्री देखी ही नहीं। उनका कहना था कि पूरा मामला गवाहों और जांच अधिकारियों की रिपोर्ट पर आधारित है, जबकि वीडियो खुद अदालत के समक्ष प्राथमिक साक्ष्य के रूप में मौजूद था। हाई कोर्ट ने माना कि यह गंभीर खामी है और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के प्रावधानों के मुताबिक वीडियो को प्रत्यक्ष रूप से देखना अदालत की जिम्मेदारी है।

 

न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि गवाहों की गवाही या पुलिस अधिकारियों की रिपोर्ट किसी भी हालत में मूल साक्ष्य का विकल्प नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि जब किसी अभियुक्त पर अश्लील सामग्री रखने या वितरित करने का आरोप हो, तो यह अदालत का दायित्व है कि वह स्वयं जांच करे कि सामग्री वास्तव में अश्लील है या नहीं। चूंकि निचली अदालत और अपीलीय अदालत दोनों ने ही वीडियो देखने की जहमत नहीं उठाई, इसलिए उनका फैसला कानूनी दृष्टि से टिकाऊ नहीं है।

 

अंततः केरल हाई कोर्ट ने हरिकुमार की दोषसिद्धि और सजा दोनों को रद्द कर दिया। इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि किसी भी मामले में जहां इलेक्ट्रॉनिक या विजुअल साक्ष्य प्रस्तुत किए जाएं, वहां अदालत को उन्हें प्रत्यक्ष रूप से जांचना अनिवार्य है। यह निर्णय आने वाले समय में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा और सुनिश्चित करेगा कि केवल गवाहों या पुलिस रिपोर्ट पर आधारित फैसले अदालतों में स्वीकार्य न हों।

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