अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत सरकार ने अपनी निर्यात नीति की व्यापक समीक्षा शुरू कर दी है। बदलते वैश्विक हालात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता को देखते हुए अब निर्यात रणनीति को ज्यादा व्यावहारिक और भविष्य के अनुरूप बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी क्रम में सरकार एक्सपोर्ट प्रिपेयर्डनेस इंडेक्स (EPI) में अहम बदलाव करने की तैयारी कर रही है, ताकि राज्यों और सेक्टर्स की वास्तविक क्षमता और चुनौतियों को बेहतर तरीके से आंका जा सके।
सूत्रों के अनुसार, EPI में शामिल कुछ पुराने और अप्रासंगिक मानकों को हटाने का फैसला लिया गया है। इनमें ऐसे पैरामीटर भी शामिल हैं, जिनका मौजूदा निर्यात ढांचे में सीमित महत्व रह गया है, जैसे एक्सपोर्ट कमिश्नर की अनिवार्यता। सरकार का मानना है कि अब इंडेक्स को केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित रखने के बजाय जमीनी स्तर पर निर्यात की तैयारियों, लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्लोबल सप्लाई चेन से जुड़ी वास्तविक चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए। हालांकि, अगले साल जारी होने वाले नए EPI का अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं हुआ है और इस पर विभिन्न मंत्रालयों के साथ मंथन जारी है।
वैश्विक स्तर पर अस्थिर माहौल ने भारत की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। खासतौर पर उस स्थिति में, जब भारत के सबसे बड़े ट्रेडिंग पार्टनर अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर करीब 50 प्रतिशत तक टैरिफ लागू कर दिया। इस फैसले का सीधा असर भारत के कई निर्यात-आधारित सेक्टर्स पर पड़ा, जिनमें मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग गुड्स और कुछ एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स शामिल हैं। अमेरिका में लागत बढ़ने के कारण भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हुई, जिससे सरकार को अपनी निर्यात प्राथमिकताओं पर दोबारा विचार करना पड़ा।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अब भारत की निर्यात रणनीति में डाइवर्सिफिकेशन को केंद्र में रखा गया है। सरकार का फोकस केवल अमेरिका जैसे पारंपरिक बाजारों पर निर्भर रहने के बजाय नए और उभरते बाजारों की ओर बढ़ने का है। एशिया, अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों को अब संभावनाओं से भरे अहम निर्यात गंतव्य के तौर पर देखा जा रहा है। इन क्षेत्रों में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ाने के लिए व्यापार समझौतों, कूटनीतिक प्रयासों और लॉजिस्टिक सपोर्ट को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
इसके साथ ही नीति निर्माण को ज्यादा मजबूत बनाने के लिए सरकार डेटा आधारित दृष्टिकोण अपना रही है। MoSPI और RBI के सहयोग से सेवाओं के निर्यात से जुड़ा विस्तृत डेटा जुटाया जा रहा है, ताकि नीतियां केवल वस्तुओं तक सीमित न रहें, बल्कि सर्विस सेक्टर की वास्तविक स्थिति और संभावनाओं को भी समाहित कर सकें। सरकार का मानना है कि बदलते वैश्विक व्यापार परिदृश्य में भारत की निर्यात सफलता इसी बात पर निर्भर करेगी कि वह कितनी तेजी से नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल पाता है और नए बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत करता है।
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