ग्रेटर नोएडा निक्की हत्याकांड: पहले बताया जलाया गया, अब कहा सिलेंडर फटा – सरकार क्यों घुमा रही केस की कहानी?
ग्रेटर नोएडा का निक्की हत्याकांड लगातार चर्चा में है, लेकिन सात दिन बाद भी इस मामले की गुत्थी उलझती जा रही है। शुरुआत में यह खबर आई कि निक्की को उसके पति विपिन भाटी और परिवारवालों ने बेरहमी से जला दिया। निक्की की बहन और बेटे ने भी यही आरोप लगाए कि पहले उस पर कुछ डाला गया और फिर लाइटर से उसे आग के हवाले कर दिया गया। लेकिन अब पुलिस और अस्पताल रिकॉर्ड से एक नया एंगल सामने आ गया है, जिससे मामले की दिशा ही बदलने लगी है।
दरअसल, 21 अगस्त की शाम जब निक्की को अस्पताल ले जाया गया, तब उसने खुद कहा कि घर पर सिलेंडर फटने से आग लगी थी और उसी में वो झुलस गई। अस्पताल की मेमो कॉपी में भी यही दर्ज है और पुलिस को यह बयान सौंपा गया। सवाल यह उठता है कि अगर निक्की ने मरते वक्त सिलेंडर फटने की बात कही थी, तो फिर सरकार और पुलिस ने शुरुआती दिनों में ‘हत्या’ की थ्योरी क्यों हवा दी? क्या यह सच दबाने की कोशिश थी या फिर केस को जानबूझकर उलझाया गया?
पुलिस जांच में बड़ा ट्विस्ट तब आया जब घर की तलाशी के दौरान कहीं भी सिलेंडर फटने के सबूत नहीं मिले। उल्टा मौके से थिनर बरामद हुआ, जिससे आग भड़काई जा सकती है। यह तथ्य मामले को और संदेहास्पद बना देता है। अगर सिलेंडर फटा ही नहीं, तो अस्पताल के रिकॉर्ड में निक्की के बयान को क्यों दर्ज किया गया? और सरकार व प्रशासन इस दोहरी कहानी पर चुप क्यों बैठे हैं?
इस पूरे घटनाक्रम ने कानून की उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा कर दिया है, जिसमें मरते वक्त व्यक्ति के शब्दों को सबसे पवित्र और सच्चा माना जाता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत मृत्युकालिक घोषणा अदालत में साक्ष्य मानी जाती है। मगर सवाल यही है कि क्या निक्की उस वक्त मानसिक रूप से ठीक थी? क्या उसने दबाव में यह बयान दिया? और क्या सरकार इस बयान का इस्तेमाल विपिन भाटी को बचाने के लिए कर रही है?
निक्की की बहन और बेटे ने खुले तौर पर आरोप लगाया है कि यह सीधा-सीधा मर्डर है। उनका कहना है कि आंखों के सामने निक्की को जिंदा जलाया गया। बावजूद इसके, पड़ोसियों और गांववालों का एक बड़ा वर्ग विपिन के समर्थन में खड़ा है और निक्की पर ही खुद आग लगाने का आरोप मढ़ रहा है। वीडियो और सीसीटीवी फुटेज का सहारा लेकर लगातार केस को इधर-उधर मोड़ा जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकार और पुलिस इस मामले में साफ तस्वीर क्यों पेश नहीं कर रहे? क्यों कभी हत्या, कभी आत्महत्या और कभी सिलेंडर फटने की कहानी गढ़ी जा रही है? क्या ये सबूतों से छेड़छाड़ का मामला है? क्या प्रशासन दबाव में काम कर रहा है? निक्की की मौत की असली वजह जानना सिर्फ उसके परिवार का हक नहीं बल्कि समाज और न्याय व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखने के लिए भी जरूरी है। इस केस को जितना घुमाया जा रहा है, उतना ही सरकार पर अविश्वास गहराता जा रहा है।
और अब यही वजह है कि विपक्ष भी सवाल खड़े करने लगा है कि सरकार इस पूरे मामले पर खामोश क्यों है? एक महिला की मौत के बाद इतने विरोधाभासी बयान आ रहे हैं, मगर सत्ता पक्ष की ओर से न तो पीड़ित परिवार से मुलाकात की गई और न ही जनता के सामने कोई स्पष्ट जवाब रखा गया। जब न्याय व्यवस्था और पुलिस दोनों पर सवाल उठने लगें, तो सीधे तौर पर जिम्मेदारी सरकार पर ही आती है। यह खामोशी कहीं न कहीं इस बात का सबूत है कि केस को दबाने की कोशिश हो रही है, ताकि सच्चाई सामने न आ पाए।
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