धड़क 2 रिव्यू: जातिवाद की हकीकत को टटोलती है कहानी, ‘धड़क’ से बेहतर लेकिन ओरिजिनल से कमजोर
सिद्धांत चतुर्वेदी और तृप्ति डिमरी स्टारर धड़क 2 सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। इस बार फिल्म का निर्देशन शाजिया इकबाल ने किया है और कहानी को एक गंभीर सामाजिक मुद्दे – जातिवाद – की पृष्ठभूमि में बुना गया है। जहां पहली धड़क को ‘सैराट’ का ग्लॉसड रीमेक कहा गया था, वहीं धड़क 2 एक परिपक्व और संवेदनशील प्रस्तुति के रूप में सामने आती है।
फिल्म की कहानी एक बार फिर दो अलग-अलग जातियों से ताल्लुक रखने वाले युवा प्रेमियों पर केंद्रित है, लेकिन इस बार उनका संघर्ष अधिक वास्तविक और सामाजिक रूप से तीखा है। निर्देशक शाजिया इकबाल ने जिस तरह से ग्रामीण परिवेश और सामाजिक ढांचे को पर्दे पर उतारा है, वह कहीं न कहीं सैराट की आत्मा को छूता है। मगर कुछ जगहों पर फिल्म की गति धीमी पड़ती है और कथानक थोड़ी खिंचा हुआ लगता है।
सिद्धांत चतुर्वेदी ने अपने किरदार में गहराई और संतुलन दिखाया है। वहीं तृप्ति डिमरी का अभिनय भी काफी प्रभावशाली है। दोनों की केमिस्ट्री फिल्म की जान है, जो स्क्रीन पर उनकी प्रेम कहानी को विश्वसनीय बनाती है। संगीत साधारण है लेकिन बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों को भावनात्मक गहराई देने में मदद करता है।
जहां धड़क 2 में पहले पार्ट के मुकाबले ज्यादा सामाजिक सोच और परिपक्वता देखने को मिलती है, वहीं यह अब भी ओरिजिनल मराठी फिल्म सैराट की तीव्रता और प्रभावशाली कथानक से कुछ कदम पीछे नजर आती है। फिर भी, यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है जो रोमांस के साथ सामाजिक यथार्थ को परदे पर देखना चाहते हैं।
कुल मिलाकर, धड़क 2 न सिर्फ एक लव स्टोरी है बल्कि यह उस सामाजिक ताने-बाने पर भी सवाल उठाती है जो आज भी युवा प्रेम की राह में दीवार बनकर खड़ा है। यह फिल्म सोचने पर मजबूर करती है, भले ही वह अपने स्रोत जितनी दमदार न हो।
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