May 1, 2026

दिल्ली एमसीडी की सफाई व्यवस्था पर सवाल, स्वच्छता रैंकिंग में फिर फिसड्डी

देश की राजधानी दिल्ली का सबसे बड़ा निकाय होने के बावजूद एमसीडी (दिल्ली नगर निगम) स्वच्छता के मोर्चे पर बार-बार असफल होता नजर आ रहा है। जिस निकाय को अन्य शहरों के लिए मिसाल पेश करनी चाहिए थी, वह खुद ही स्वच्छता सर्वेक्षण में पिछड़ता जा रहा है। 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में एमसीडी को 44 में से 31वां स्थान मिला है। यह रैंकिंग अपने आप में चिंताजनक है, क्योंकि बीते वर्ष 446 शहरों की रैंकिंग में भी एमसीडी को 90वां स्थान ही मिल सका था।

एमसीडी के पास 55 हजार से ज्यादा सफाई कर्मचारी और करीब 5 हजार करोड़ रुपये का सालाना बजट है। इसके बावजूद न तो सार्वजनिक स्थलों की स्थिति सुधर रही है और न ही आम नागरिकों के लिए साफ-सुथरा वातावरण तैयार हो पा रहा है। रिहायशी कॉलोनियों से लेकर बाजारों तक में गंदगी के ढेर आम बात हो गई है। खास बात यह है कि सफाई का दावा तो किया जाता है, लेकिन बाजारों में सुबह 10 बजे के बाद और दोपहर तक गंदगी की स्थिति और भी खराब हो जाती है।

दिल्ली के कई इलाकों में मौजूद सार्वजनिक शौचालयों की हालत बेहद खराब है। इनमें से अधिकतर उपयोग करने लायक नहीं होते, जिससे लोग मजबूरी में खुले में शौच करने को मजबूर हो जाते हैं। रिहायशी इलाकों में विशेषकर अनधिकृत कॉलोनियों और झुग्गी-झोपड़ियों में स्थिति और भी खराब है। सफाई कर्मचारी यहां काम तो करते हैं, लेकिन लोगों की लापरवाही और कचरा फेंकने की आदतों पर रोक नहीं लगने से स्थिति बार-बार बिगड़ जाती है।

एमसीडी द्वारा संवेदनशील इलाकों को लेकर कोई विशेष रणनीति नहीं अपनाई जा रही है। जिन स्थानों को ‘कचरा संवेदनशील’ घोषित किया गया है, वहां भी सुधार के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। न तो लोगों को जागरूक किया जा रहा है, और न ही गंदगी फैलाने वालों पर कोई सख्त कार्रवाई हो रही है।

स्वच्छता सर्वेक्षण में लगातार मिल रही निचली रैंकिंग इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली की सफाई व्यवस्था को लेकर जमीनी स्तर पर गंभीर प्रयासों की सख्त जरूरत है। बिना जनता की भागीदारी और प्रशासनिक सख्ती के दिल्ली को साफ-सुथरा बनाना मुश्किल ही नहीं, लगभग नामुमकिन है।

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