April 30, 2026

‘एहतियातन हिरासत असाधारण शक्ति, इसका संयम से हो इस्तेमाल’ — सुप्रीम कोर्ट ने केरल के मामले में राज्य सरकार को लगाई फटकार

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एहतियातन हिरासत से जुड़े एक अहम फैसले में साफ कहा है कि यह संविधान द्वारा राज्य को दी गई एक “असाधारण शक्ति” है, जिसका प्रयोग सामान्य परिस्थितियों में नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह टिप्पणी केरल में एक साहूकार की गिरफ्तारी के मामले में की, जहां जिलाधिकारी द्वारा जारी हिरासत आदेश को अवैध ठहराते हुए उसे खारिज कर दिया गया।

 

क्या था मामला?

राज्य के पलक्कड़ जिले में एक व्यक्ति राजेश, जो ‘रितिका फाइनेंस’ नामक निजी फाइनेंस कंपनी चलाता था, को जिला मजिस्ट्रेट ने एहतियातन हिरासत में लेने का आदेश दिया था। राजेश चार मामलों में पहले ही जमानत पर था, लेकिन जिला प्रशासन का तर्क था कि वह फिर से अवैध गतिविधियों में शामिल हो रहा है।

 

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति जमानत की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो इसका समाधान एहतियातन हिरासत नहीं, बल्कि जमानत रद्द करने के लिए न्यायालय का रुख करना है।

 

कोर्ट ने कहा, “राज्य को मिली एहतियातन हिरासत की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 22(3)(बी) में निहित है, लेकिन यह शक्ति नागरिक की स्वतंत्रता को छीनने वाली है और इसका उपयोग अत्यंत सावधानी से होना चाहिए। इसे किसी के संभावित अपराध के अंदेशे पर नहीं, बल्कि ठोस और तर्कसंगत आधार पर ही लागू किया जाना चाहिए।”

 

हाईकोर्ट और डीएम का फैसला भी खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने 20 जून, 2024 को जारी हिरासत आदेश और 4 सितंबर, 2024 को केरल हाईकोर्ट द्वारा इसे सही ठहराने वाले फैसले को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा कि हिरासत आदेश में जिन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है, वे केवल जमानत रद्द करने के लिए पर्याप्त हो सकती थीं, मगर एहतियातन हिरासत का आधार नहीं बन सकतीं।

 

कोर्ट ने क्या कहा आदेश में?

कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण बिंदु स्पष्ट किए:

 

1. हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी को सबसे पहले जमानत रद्द करने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी।

 

2. हिरासत की अधिकतम अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी थी, इसलिए इसे कानूनी रूप से जारी नहीं रखा जा सकता।

 

राज्य सरकार को भविष्य के लिए चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि भविष्य में राज्य सरकार बंदी की जमानत रद्द करने के लिए याचिका दाखिल करती है, तो संबंधित अदालत को इस आदेश की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना उस याचिका पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना चाहिए।

 

यह फैसला न केवल राज्य की शक्तियों की सीमा को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन के मामलों में न्यायिक सतर्कता कितनी ज़रूरी है। कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि “राज्य की शक्ति न्याय के दायरे में हो, मनमानी का माध्यम न बने।”

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